33. पाठक की मृत्यु


प्रायः दस साल पहले की बात है।
आसनसोल स्टेशन पर ट्रेन की प्रतीक्षा में बैठा था। मेरे पास ही एक सज्जन बैठे हुए थे। उनके हाथों में एक किताब थी। खासा मोटा उपन्यास था। आलाप-परिचय होने पर पता चला, सज्जन को उनकी ट्रेन के लिए दिनभर प्रतीक्षा करनी है।
मेरी ट्रेन में भी तीन घण्टे की देरी थी।
हमदोनों ही बँगाली थे।
अतः पाँच मिनट बाद ही मैंने उनसे जो प्रश्न किया, वह यह था-
"आपकी किताब एकबार देखूँ जरा?"
"हाँ-हाँ, देखिये- "
यह उत्तर ही स्वाभाविक था और इसी की आशा की थी मैंने।
बिना देर किये किताब पर कब्जा जमाया मैंने।
भीषण ग्रीष्म की चिलचिलाती द्विप्रहर।
आसनसोल स्टेशन की टीन की छत।
सब लेकिन खो गये।
अद्भुत उपन्यास था!
किताब के मालिक सज्जन ने तिरछी नजरों से मेरी तरफ देखकर एकबार भौंहों को सिकोड़ा और फिर टाईम-टेबल लेकर उसी में अपना मन लगा लिया।
मैं दम साधकर पढ़ता चला गया।

कमाल की किताब थी।
वास्तव में इतना बढ़िया उपन्यास मैंने इससे पहले नहीं पढ़ा था।
मैं तो उसमें डूब ही गया।
दो घण्टे बीते।
किताब के मालिक सज्जन टाईम-टेबल को बारम्बार उलट-पलट कर अन्त में मेरी तरफ देखकर बोले, "आपकी ट्रेन में तो और ज्यादा समय नहीं है। अब जरा- "
कह कर एकबार उन्होंने गला खँखारा।
मैं उस समय तन्मय था।
जल्दी से एकबार हाथघड़ी पर नजर डाला। अभी भी घण्टा भर समय था। किताब लेकिन आधी से ज्यादा बाकी थी। बातचीत में समय नष्ट नहीं किया। गोग्रास के समान निगलना शुरु किया।
अद्भुत किताब!
बचा हुआ एक घण्टा मानो उड़ते हुए बीत गया।
मेरी ट्रेन की घण्टी बजी।
किताब उस वक्त भी काफी बाकी थी।
धुन सवार हो गयी थी।
बोला, "नेक्स्ट ट्रेन से जाऊँगा। इस किताब को पूरा किये बिना नहीं उठ सकता।"
किताब के मालिक थोड़ा खाँसकर निर्वाक् रह गये।
ट्रेन चली गयी; किताब पढ़ता रहा।
किताब पूरा लेकिन नहीं ही कर पाया।
अन्त के कई पन्ने गायब थे।
किताब के मालिक से कहा, "ओह, आखिर के इतने सारे पन्ने हैं ही नहीं! पहले क्यों नहीं बताया? छिः-छिः- "
एतदुत्तर में सज्ज्न निष्पलक मेरी तरफ देखते रहे। देखा, उनकी गर्दन की शिरायें फूल रही थीं।

--दो--
दस साल बाद वही पुस्तक फिर एकबार मेरे हाथ लगी।
मेरी भाँजी के ससुराल में।
उसे पहुँचाने गया था। उसी दिन लौट आने की बात थी। लेकिन किताब के लोभ में रुक गया।
समय निकाल कर किताब हाथ में लेकर आग्रह के साथ फिर शुरु किया। बेतरतीब तरीके से अन्तिम अंश पढ़ने के बजाय तय किया, प्रारम्भ से ही मन लगाकर पढ़ा जाय।
कुछ पन्ने पढ़ते ही कैसा एक खटका लगा।
पलट कर देखा- हाँ, किताब तो वही है!
फिर कुछ पन्ने आगे बढ़ा- ऊँहूँ, कहीं तो कुछ गड़बड़झाला है।
फिर भी पढ़ता रहा।
कुछ देर बाद अनुभव हुआ- नाः, और झेला नहीं जा सकता।
यह क्या वही किताब है, जिसे मैंने आसनसोल स्टेशन पर भीषण ग्रीष्म की दुपहरिया में साँस रोके तन्मय होकर पढ़ा था?
इतना रबिश भी भला कोई लिखता है!
इसे तो पूरा करना असम्भव है।
दस साल पहले का वह उत्सुक पाठक कब जो मर गया, इसकी भनक तक नहीं लगी।
इस बार भी किताब पूरी नहीं हुई।
--ः0ः--

32. विद्यासागर




विदा लेने से पूर्व विनम्र नमस्कार कर वे सज्जन बोले, ”उस मोड़ पर डिस्पेन्सरी खोला हूँ मास्साब, कभी पधारियेगा-
अच्छा।
...स्मृतिपटल पर कई छवियाँ तैरने लगीं।
पुरातन छवियाँ।
***
मैं ट्यूशनी करता था।
बी.ए. में कई बार फेल होने के कारण ही हो, या स्वामी चिन्मयानन्द के सत्संग का लाभ ही हो- मैं आध्यात्मिक हो चला था। स्वामी चिन्मयानन्द के चरणकमलों में बैठ कर हिन्दू धर्म के अनेक गूढ़ तत्वों का मैं श्रवण करता था। सोचता था, कर्म जगत में चाहे जो हो, धर्म जगत में हिन्दू अपराजेय हैं। प्रतिदिन स्वामी जी धार्मिक एवं आध्यात्मिक जो प्रवचन करते थे, वे सब इस कथा के लिए अवांछनीय हैं। सिर्फ प्रासंगिक बातें ही सुनिये।
एक दिन वे पूर्व-जन्म रहस्य पर सारगर्भित प्रवचन कर रहे थे। ऐसी कौतूहलोद्दीपक वार्ता मैंने इससे पूर्व नहीं सुनी थी। वह एक अद्भुत वार्ता थी!
मैं अत्यन्त आकृष्ट हुआ। स्वामी जी की वक्तृता समाप्त होने पर मैं पीछे पड़ा- पूर्व-जन्म का रहस्य जानने का पथ बताना ही होगा।
शुरु में उन्होंने आपत्ति की।
मैं भी पीछे पड़ गया।
अन्त में उन्हें बताना पड़ा।
उनके उपदेशानुसार मुदितनेत्र से नानाविध यौगिक प्रक्रियायें मैंने शुरु की।
जन्म-जन्मान्तर का रहस्य उद्घाटन करना ही होगा।
***
छात्र को पढ़ा रहा था।
”‘साधूशब्द का चतुर्थी में बहुवचन क्या होगा?“
नहीं बता पाया।
”‘मुनिशब्द का द्वितीया में द्विवचन क्या होगा?“
नहीं सका।
”‘नरशब्द का द्वितीया में एकवचन क्या होगा?“
काफी देर तक सिर खुजाकर एक उत्तर दिया- भूल उत्तर। एक झापड़ लगाकर मैंने उपक्रमणिकाफेंक दिया।
...ऐसा रोज होता था।
***
अचानक मन में आया, देखा जाय कि यह छोकरा पिछले जन्म में क्या था। मुझे विश्वास था कि गधा या बैल रहा होगा। स्वामी जी द्वारा प्रदर्शित प्रक्रिया का अनुसरण कर इस कौतूहल का निवारण करना तो बहुत ही सहज था।
उस दिन गहन नीशीथ में योगासन में उपवेशन कर मुदित नेत्रों के सम्मुख रूद्धश्वांस से अपने छात्र के पूर्वजन्म की मूर्ति का निरीक्षण कर मैं चौंक उठा।
यह क्या- यह तो विद्यासागर हैं!
प्रातःस्मरणीय विद्यासागर, जिन्होंने बँगला भाषा का संस्कार किया है!
स्वयं उपक्रमणिकाके रचयिता जन्मान्तर रहस्य के फेर में पड़कर नरशब्द का रुप नहीं बता पा रहे हैं! आश्चर्य की बात है!
मैं स्तम्भित रह गया।
अगले दिन भी वह छात्र शब्दरुप सही ढंग से नहीं बता पाया।
किन्तु उसे सजा देने की प्रवृत्ति मेरी नहीं हुई।
जी में आया, प्रणाम करुँ-
अश्रुजल से उनके चरणयुगल धो डालूँ।
विद्यासागर की यह दशा!
जब तक मैंने उसे पढ़ाया, उसे सजा नहीं दे पाया- स्वयं को रोक लेता था।
फलस्वरुप चौथी कक्षा ये आगे वह बिलकुल नहीं बढ़ पाया।
मेरी ट्यूशनी गयी। सौभाग्य से, अन्यत्र एक जगह किरानीगिरी मिल गयी, वहीं चला गया।
***   
प्रायः पाँच वर्षों के बाद मेरे नये कार्यस्थल पर विद्यासागर के साथ फिर भेंट हुई। सारी बातें मैंने सुनी। पढ़ाई-लिखाई छोड़कर कुछ समय के लिए वह शौकिया थियेटर में रम गया था। स्त्री-भूमिका में वह न कि अच्छा अभिनय कर लेता था! मेडल मिला है। सम्प्रति किन्तु वह लाईफ-इन्श्योरेन्स का एजेण्ट है। अगर मैं अनुग्रह कर उसकी कम्पनी में-
मेरी आँखें भींग गयीं।
साध्यातीत होने पर भी कुछ कुछ रकम इन्श्योरेन्स में लगाया।
फिर आज वह आया था।
चेहरा अच्छा-खासा भद्र और भारी हो गया था। बताया, इन्श्योरेन्स की दलाली से वह कुछ खास नहीं कर पाया, इसलिए प्राइवेट से होम्योपैथी पढ़कर वह डॉक्टर बन गया है और इसी शहर में प्रैक्टिस करने का निर्णय लिया है। मैं उसका ध्यान रखूँ।
यथासाध्य रखूँगा- प्रतिश्रुति दिया मैंने।
निष्प्रयोजन समझकर दो खबरें मैंने उसे नहीं दी। दोनों खबरें निम्न प्रकार हैं-
1. स्वामी चिन्मयानन्द चौर्यापराध में जेल की चक्की पीस रहे हैं।
2. मैं क्रिश्चियन हो गया हूँ।
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33. पाठक की मृत्यु

प्रायः दस साल पहले की बात है। आसनसोल स्टेशन पर ट्रेन की प्रतीक्षा में बैठा था। मेरे पास ही एक सज्जन बैठे हुए थे। उनके हाथों में एक कि...