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30. खड़ाऊँ का मारा

फ्रेंचकट दाढ़ी, देवानन्द टाईप जुल्फें, पहनावा विचित्र लुंगी, मुँह में सर्वदा प्यांज-लहसु की गन्ध- ऐसे व्यक्ति का नाम है, राधावल्लभ। पितामह-प्रदत्त नाम। कहते हैं कि रुस में नाम बदलने की सुविधा है। अपने देश में भी अनेक छात्र-छात्रायें मैट्रिक परीक्षा देने से पहले अपनी पसन्द के मुताबिक नामकरण कर लेते हैं। राधावल्लभ को मैट्रिक देने का मौका एकबार मिला जरूर था, किन्तु नाम बदलने की बात उनके ध्यान में ही नहीं आयी। धरती पर ऐसी अनहोनी क्यों घटती है, बताना कठिन है। इस दुरुह गवेषणा की ओर प्रवृत्त न होकर मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि राधावल्लभ नाम जरा और आधुनिक होता, तो मेल अच्छा बैठता। क्योंकि राधावल्लभ सचमुच ही एक आधुनिक युवक हैं। विचार, पोशाक, बातचीत और विशेषकर उपार्जन के मामले में राधावल्लभ एकदम अति-आधुनिक हैं। ब्रिज एवं फ्लैश खेलने में सुदक्ष। इसीसे उनकी आय भी होती है। आय होती है, इसलिए राधावल्लभ के मामा राधावल्लभ के सामने कृतज्ञ हैं। क्योंकि सिगरेट-सिनेमा का खर्चा अब उनको वहन नहीं करना होता है। यह भी कोई कम लाभ का सौदा नहीं है।--दो--मैट्रिकुलेशन परीक्षा में फेल करने के बाद से राधावल्लभ यौव…

29. ऐरावत

त्रिगुणानन्द बाबू सिर्फ त्रिगुण नहीं, बल्कि बहुत सारे गुणों से सम्पन्न थे। प्रचण्ड धार्मिक- प्रचण्ड संयमी, जबकि उम्र चालीस से कम। शरीर पर वे बहुत ध्यान देते थे। प्रतिदिन मुग्दर भाँजते थे- तीनबार दन्तधावन करते थे- दोनों बेला स्नान करते थे। पहलवान-जैसा स्वास्थ्य था। पढ़े-लिखे भी थे- सुना है, बी.ए. पास थे। दरिद्र नहीं थे- खाने-पहनने की स्थिति थी, नौकरी करने की जरूरत नहीं पड़ती। पैतृक खेतीबाड़ी जितनी थी, उसी में काम चल जाता था। हाथ में दो पैसे भी रहते थे। किन्तु त्रिगुणाबाबू की प्रसिद्धि का प्रधान कारण था- उनकी मौलिकता। और उनकी मौलिकता में मूल में था- किसी भी काम को पक्के तरीके से पूरा करना। उनकी दैनन्दिन जीवन-यापन प्रणाली संक्षेप में इस प्रकार थी। वे सोकर उठते थे बहुत ही सवेरे। उठते ही कार्बोलिक लोशन में डुबोये दतवन से दाँत साफ करते थे। इसके बाद करते थे व्यायाम। मुग्दर, डम्बल, डेवेलपर। आधे घण्टे व्यायाम के बाद वे पसीने से तर शरीर के साथ पास की नदी में जाकर स्नान करते थे।स्नान कर भैरव राग में एक भजन गाते हुए वे घर लौटते थे। क्या शीत, क्या ग्रीष्म- प्रातःकाल में स्नान उन्हें करना ही था। घर लौ…