35. मिस्टर मुखर्जी



मिस्टर मुखर्जी कब जो हमारे अड्डे में आकर शामिल हो गये थे, ठीक से याद नहीं। सिर्फ इतना ही याद है कि स्वर्गीय मधु मामा एक दिन उनको हमारे अड्डे में लाये थे। उसके बाद से बीच-बीच में वे धूमकेतु की तरह हमारे अड्डे में आना-जाना करते थे। उनका घनिष्ठ परिचय हममें से कोई नहीं जानता।
आदमी में कुछ खसियत तो थी।
उनकी बातचीत सुनकर लगता था, मानो सारी दुनिया उनकी मुट्ठी में है। चाहने पर वे उसे चूर-चूर कर सकते हैं; चूर भी कर सकते हैं- जेब में भी डाल सकते हैं।
अक्सर चुटकी बजाकर वे कहते, ”यह सब मैं थोड़े केयर करता हूँ- समझे!
समझते तो सब थे।
मुखर्जी ऊँचे दर्जे के एक मिथ्यावादी हैं- इस मुद्दे पर हमलोगों के बीच कोई मतभेद नहीं था। लेकिन हममें से कोई भी मुखर्जी की बातों का प्रतिवाद नहीं करता था। नहीं करता था, क्योंकि उनकी मिथ्या बातें भी सुनने में अच्छी लगती थीं। इस मामले में वे जन्मजात आर्टिस्ट थे। 
रूग्ण, अनाहार-क्लिष्ट चेहरा। शेविंग का अभाव चेहरे पर सुस्पष्ट। शरीर पर अधमैला साहेबी पोशाक। सुनने में आया कि विलायत हो आये हैं, दुनिया के बहुत सारे देश घूम चुके हैं- खुद ही कहते थे यह सब। वे निरे मूर्ख नहीं थे- यह उनकी बातचीत से ही पता चलता था। एकदिन खुद ही उन्होंने कहा था कि वे डबल एम.ए. हैं। तीन बार प्रोफेसरी करके फिर छोड़ चुके हैं- इत्यादि।
एकदिन वे बता रहे थे-
महात्माजी के साथ उसदिन भेंट हुई- ट्रेन में। थर्ड क्लास के एक कोने में बैठकर तकली घुमा रहे थे- मुझे देखकर धीरे-से मुस्कुराये। शायद अफ्रिका के दिन याद आ गये। जब वे अफ्रिका गये थे, मैं तब वहीं था- खूब छनती थी हमदोनों की! देखा, उन्होंने पहचान लिया है मुझे। आगे बढ़ा। अफ्रिका के वे दिन याद आ गये। सोचा, जरा हास्य किया जाय। बोला- महात्माजी, आपने जो सारे देशवासियों को निरामिष होने के लिए कहा है, इसके दूसरे पहलू पर भी कभी विचार किया है? सभी यदि आपकी बात मान लें, तो एक और गम्भीर समस्या उठ खड़ी होगी, यह आपने सोचा है?’
महात्माजी बोले, ‘कौन-सी समस्या?’
मैंने कहा, ‘बकरी समस्या। उन्हें नहीं खाने से इस कृषि-प्रधान देश में तो सर्वनाश हो जायेगा। बकरी एकबार जिस पौधे को मुँह लगाती है, उसका तो बस रफा-दफा! एक-एक बकरी हर साल कितने बच्चे देती है, पता है आपको?’“
यहाँ तक बात करके मुखर्जी बोल पड़े, ”एक्सक्यूज मी, मुझे अभी चलना होगा। बाहर वाले कमरे के टेबल पर पर्स छोड़ आया हूँ, उसमें हजार रुपये का एक चेक है। हालाँकि क्रॉस्ड है, फिर भी-
मिस्टर मुखर्जी ने प्रस्थान किया।
कोलकाता के किस अँचल में वे रहते थे- कोई नहीं जानता था। कोई कहता- बालीगंज, कोई बताता- बेलेघाटा। भवेश, पानू-जैसों का दृढ़ विश्वास था कि बहूबाजार अँचल में ही कहीं रहते हैं वे।
अगले दिन ससंकोच मैंने उनसे पूछा था, ”मिस्टर मुखर्जी, आपका डेरा कहाँ है?“ हँसकर मेरी पीठ थपथपा कर कहा था उन्होंने, ”मंगल ग्रह में अभी तक जमीन नहीं खरीद पाया हूँ। इसी पुरानी पृथ्वी पर अब तक रहना पड़ रहा है, यही अफसोस है। काश्मीर कहिये, स्विजरलैण्ड कहिये, सब एक हैं। न्यूयॉर्क, रोम, प्राग, बर्लिन, टोक्यो, यहाँ तक कि वोल्गा नदी के तट पर भी बहुत दिन बिताये हैं मैंने- सभी जगह यही बूढ़ी पृथ्वी- एकरस। ऐरोप्लेन के थोड़ा और उन्नत होते ही देखियेगा झुण्ड के झुण्ड लोग दूसरे प्लैनेट की ओर भागेंगे। ...ओह, बाय जोव- उठना पड़ेगा- मिसेज नायडू के साथ एक एंगेजमेण्ट है-
सबको विस्मित छोड़ उन्होंने प्रस्थान किया।
उस दिन भी आये और उस दिन बरट्रैण्ड रेल, बर्नाड शॉ, बॉल्डविन, ब्लूम, शेक्सपीयर, गेटे, सबकी धज्जियाँ उड़ाते-उड़ाते अचानक उन्हें याद गया कि एक अमेरिकी करोड़पति की इकलौती बेटी के लिए उड़ीसा की शिल्पकारी वाली नक्काशीदार बालियाँ भिजवाने का उन्होंने वादा कर रखा है। परसों बालियों का जोड़ा उड़ीसा से रवाना हो चुका है। आज एयर मेल डे है, अतः हमलोग उन्हें एक्सक्यूज करें।
वे ज्यादा देर बिलकुल नहीं टिकते थे।
धूमकेतु की तरह आते और चले जाते।
वे चालबाज, मिथ्यावादी हैं- समझ में आता था।
फिर भी, अच्छा लगता था।
हमारे अड्डे में उस दिन हल्के जलपान का आयोजन था। उपलक्ष्य- पानू के प्रेम की अन्त्येष्टि क्रिया। पानू ने अपनी प्रेमिका से विवाह कर डाला था। पास के एक रेस्तोराँ से देशी-विदेशी नाना प्रकार की खाद्य-सामग्रियाँ मँगवायी गयी थीं। भवेश आवेग के साथ स्वर्ग से विदाईका पाठ कर रहा था, विमलदा दक्षिण चक्षु को कुंचित कर क्लारियोनेट के नीपरदे पर सुर सृष्टि कर वातावरण को करूण बनाने में प्रयासरत थे, विकास टेबल पर तबला बजा रहा था, जगू गिलासों में शर्बत डाल रहा था, पानू प्लेट सजा रहा था, मैं एक कोने में बैठकर कानी उँगली का नाखून काट रहा था- अर्थात् माहौल जम चुका था।
ऐसे में मिस्टर मुखर्जी आकर हाजिर।
पानू ने सोल्लास कहा, ”वाह, अच्छा हुआ मिस्टर मुखर्जी आ गये। आपका पता तो हमलोग ठीक-ठीक जानते नहीं थे कि आपको खबर दे सकें। आज हमारे बीच जलपान की थोड़ी व्यवस्था है। मिस्टर मुखर्जी-
हाथ जोड़कर मिस्टर मुखर्जी बोले, ”माफ कीजियेगा, कुछ खा नहीं सकता। शाम को एस्प्लेनेड मोड़ पर मिस म्यूल से भेंट हो गयी थी। ऑस्ट्रेलिया में मेरी टेनिस पार्टनर थी। मुझे छोड़ा ही नहीं- फिर्पो में जाकर ठूँसना पड़ा उसके साथ। बहुत दिनों से फिर्पो में गया नहीं था- आजकल बहुत डिटोरियेट हो गया है। मिस म्यूल के चक्कर में पड़कर काफी रुपये निकल गये। क्या किया जाय! बहुत दिनों बाद मुलाकात हुई थी। इसके अलावे, उस लड़की के प्रति मेरा सॉफ्ट कॉर्नर भी था उस जमाने में- हाः-हाः-हाः-
भवेश बोला, ”फिर भी कुछ तो लीजिये। कम-से-कम एक गिलास शर्बत-
लेता। शर्बत ही क्यों, और भी बहुत कुछ खाता। किन्तु मिस्टर आचार्या के यहाँ आज मेरा निमंत्रण जो है। जैपेनो-एशियाटिक सेफ्टीपिन कम्पनी एक फ्लोट करना है उनको। उसी का एक निदेशक बनने के लिए मुझे परेशान किये हुए हैं आचार्या- ये सारे झमेले मेरे ही सिर पर आते हैं! मैं ठहरा आइडियलिस्ट आदमी, चट-से ना भी नहीं कर सकता। अच्छा उठता हूँ- एक्सक्यूज मी- मुखर्जी चले गये।
उस रोज अड्डा समाप्त होते-होते काफी रात हो गयी।

ट्राम नहीं था- पदयान से ही लौट रहा था।
कुछ दूरी पर एक अन्धेरी गली की मोड़ पर ऐसा लगा, एक आदमी हाथ में एक बैग लटकाये मदनानन्द मोदककी फेरी लगा रहा है। पास जाकर देखा, मिस्टर मुखर्जी। दाहिने हाथ में एक पैकेट लेकर चाहिए, मदनानन्द मोदककी हाँक लगा रहे थे। मुझे देखकर वे लेकिन जरा भी नहीं चौंके। सामान्य भाव से ही बोले, ”चीज अच्छी है। मेरा खुद का उपकार हुआ है, इसलिए और दो-चार लोगों के उपकार के लिए मैंने यह व्रत ग्रहण किया है। हाजमे की इससे अच्छी दवा और नहीं है। खाकर देखेंगे?“
मैं निर्वाक रह गया।
मेरी तन्द्रा टूटी, जब मिस्टर मुखर्जी अपने दाहिने हाथ से सहसा मेरे दोनों हाथ थामकर बोले, ”एक अनुरोध है- यह बात किसी को नहीं बताईयेगा। सभी शायद बात को ठीक से नहीं समझ पायेंगे। सोचेंगे, शायद अभाव में पड़कर ही-
काफी दिन बीत गये। मिस्टर मुखर्जी को फिर नहीं देखा। हमारे अड्डे में अब वे नहीं आते।

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34. दत्त महाशय

छोकरे की अभी ठीक से मूँछें भी नहीं उगीं, और अभी से यह काण्ड! मूँछें उगने पर पता नहीं-
इतना कह कर दत्त महाशय ने अपनी मूँछों पर दृष्टिपात किया और एक पका बाल तोड़ कर सामने बैठे विश्वास से बोले-
और कितने हैं देखना भई! एह, इस तरह पकने से तो दो दिनों में ही सब साफ हो जायेगा देख रहा हूँ।
कहाँ, और तो नहीं है! जो तोड़े, उसे दिखाना।
टूटा हुआ रोम दत्त महाशय के अंगुष्ठ एवं तर्जनी के बीच ही था।
विश्वास को उन्होंने वह दिया।
विश्वास ने हिला-डुला कर काफी देर तक उसका निरीक्षण किया और अन्त में वे बोले, ”आप कच्ची मूँछों को यूँ पटा-पट क्यों तोड़े जा रहे हैं बताईये तो जरा? यह क्या पका हुआ है? यह तो तमाखू का धुआँ लगने से ऐसा हो गया है।
दत्त महाशय इस बीच एक और बाल तोड़ चुके थे।
बोले, ”अच्छा, इसे देखो तो।
यह तो एकदम कच्चा है- तमाखू का रंग तक नहीं लगा है। और मत तोड़िये।
दत्त दक्षिण चक्षु को बन्द कर वक्रायित वाम चक्षु की दृष्टि को मूँछ की छोर पर निबद्ध किये हुए थे और ओष्ठ को नाना प्रकार से कुञ्चित-प्रसारित कर फिर नये शिकार की चेष्टा में थे। विश्वास की बातों का उन्होंने कोई प्रतिकार तो नहीं किया, मगर शीघ्र ही मुखभंगिमा के साथ उन्होंने एक तृतीय रोम का उत्पाटन किया और उसे भी विश्वास के हाथों अर्पित कर प्रथम प्रसंग को फिर छेड़ा-
यानि छोकरा मुकदमे के चक्कर में पड़ गया है। कुल्हाड़ी पर पैर मारने से अपना ही पैर कटेगा! तुमने यह खबर सुनी कहाँ? उस रोज शाम को मैं स्टेशन की ओर गया था टहलते-टहलते, तभी छोकरे का हाव-भाव देखकर कैसा एक सन्देह हुआ-
इतना कह कर दत्त महाशय रुक गये।
विश्वास ने तीसरे बाल के सम्बन्ध में कोई मन्तव्य नहीं किया। देह खुजाने लगे।
जैसे दत्त महाशय का मुद्रादोष मूँछों के बाल तोड़ना था, वैसे ही विश्वास महाशय का मुद्रादोष था शरीर खुजाना। सिर्फ खुजाकर ही वे शान्त नहीं होते थे। सर्वांग में अँगुलियों का संचालन कर पता नहीं क्या आहरण कर के लाते थे, उस आहरित वस्तु का आघ्राण करते थे और अगले ही पल नासिका कुञ्चित कर उसे फेंक देते थे। वही वे कर रहे थे।
दत्त नासिका के ठीक निम्नवर्ती मूच्छगुच्छ के पर्यवेक्षण की व्यर्थ चेष्टा करते-करते बोले, ”आपने क्या सुना है?“
खुजली से निवृत्त होकर विश्वास ने उत्तर दिया, ”सुनने में आया कि बनर्जी वकील सड़क पर किसी से कह रहे थे- एक लड़की को लेकर छोटे बाबू हमारे केस में शामिल हैं। ठीक से पूछा नहीं है मैंने- रास्ते में आते-आते सुना। स्टेशन पर उस दिन क्या देखा आपने?“
 दत्त उष्णकण्ठ से अचानक बोल पड़े, ”देखना क्या है! अपना सिर! देखा, प्लेटफार्म पर बैठी हुई थी जरीदार दुपट्टा ओढ़े बाईजी किस्म की एक सुन्दर युवती। उसके पास थे दुबले-पतले एक बुजुर्ग। पकी हुई दाढ़ी मेंहन्दी से रँगी हुई- शरीर पर अधमैला कुरता-पायजामा। उमर खैयाम वाली किताब में जिस तरह की तस्वीर रहती है न आजकल, ठीक वैसे ही। स्टेशन के छोटे बाबू को देखा, बार-बार उनकी ओर देखे जा रहे थे। स्टेशन बिलकुल सुनसान था। -इतना कह कर दत्त महाशय फिर रुक गये और मन-ही-मन सोचने लगे- इस विश्वास को इतना सब नहीं बोलने से ही होता। क्या जरुरत थी!
विश्वास फिर शरीर खुजाकर लायी गयी वस्तु को सूँघ कर अभी कुञ्चित-नासिका अवस्था में थे। दत्त की बात समाप्त होते-न होते बोल पड़े, ”वही-वही- दुपट्टे वाली उस लड़की और लाल दाढ़ी वाले उस बुजुर्ग को हमारे बनर्जी वकील अपनी आँखों से आज अदालत में देख कर आये। हमारे छोटे बाबू भी थे। आप कुछ भी कहिये, बात ठीक ही है। बर्बाद हो गये हैं आजकल के लड़के। ...अच्छा, आप अनर्थक बैठ कर मूँछों के काले बालों को यूँ तोड़े क्यों जा रहे हैं, बताईये तो जरा?“
विश्वास महाशय पिछले एक साल से दत्त की पकी मूँछों को कच्ची साबित करने की चेष्टा में हैं। दत्त इसका प्रतिवाद नहीं करते। विश्वास की इन अत्युक्तियों का उपभोग करते-करते वे पके बालों को तोड़ते रहते थे। विश्वास की बातों से बहल कर पके बालों के सम्बन्ध में वे उदासीन हो जायें, ऐसे भोले बालक दत्त महाशय नहीं थे।
लड़की वाले पकी मूँछों को कच्ची समझने की भूल नहीं करेंगे।
यह गलती विश्वास भी नहीं करते, यदि उन्हें जब-तब रुपये उधार लेने की जरुरत नहीं पड़ते रहती।
दत्त सब समझते हैं, कुछ बोलते नहीं हैं।
दत्त महाशय की दूसरी पत्नी का देहान्त हो गया है।
तीसरी पत्नी की खोज में हैं वे।
दो प्रमुख बाधायें हैं।
पकी मूँछें और विवाहयोग्य अनूढ़ा पुत्री।
पुत्री का विवाह किये बिना उनके लिए विवाह करना असम्भव था।
एकबार पुत्री का विवाह हो जाय, तो दत्त महाशय स्वछन्द होकर इस शुभ कार्य की ओर अग्रसर हो सकते थे। लेकिन मन के लायक लड़का मिल ही नहीं रहा था।
शरीर खुजाते हुए विश्वास बोले, ”इसका मतलब छोकरा रंगा सियार है।
दत्त उठ कर टेबल के ड्रॉअर से छोटा आईना निकाल कर अपनी गुम्फराशि का परिदर्शन करने लगे। कुछ बोले नहीं।
कुछ क्षण नीरवता में बीते।
नीरवता भंग कर विश्वास फिर तिक्त स्वर में बोल उठे, ”जेल हो जानी चाहिए; नौकरी चली जानी चाहिए- ऐसे लोगों की। पाजी, चरित्रहीन, आवारा ये छोकरे-
विश्वास की इस ऊष्मा के पीछे कारण था। उनकी धारणा थी, स्टेशन में नवागत छोटे बाबू की निन्दा कर वे दत्त महाशय का मनोरंजन कर रहे थे। दत्त महाशय के सामने आजकल के लड़कों को बुरा-भला कह कर विश्वास महाशय हमेशा फायदे में ही रहते थे। आज उन्हें कुछ रुपयों की जरुरत थी। अतः पकी मूँछों को कच्ची बता कर तथा आजकल के लड़के-छोकरों को बुरा-भला कह कर- अर्थात् दोनाली बन्दूक से- विश्वास महाशय लक्ष्यभेद करने की कोशिश कर रहे थे। पहले बहुत बार उन्होंने इस रास्ते से सफलता प्राप्त की थी।
लेकिन दत्त की तरफ से कोई सुगबुगाहट नहीं थी।
शरीर खुजाना बन्द करके विश्वास ने एकबार फिर तिरछी नजरों से दत्त की तरफ देखा।
दत्त ऊपर के होंठ को नीचे के होंठ से दबाकर दर्पण पर दृष्टि निबद्ध कर उसी में निमग्न रहे।
विश्वास को ठीक-ठीक समझ में नहीं आया कि दत्त महाशय के मन की प्रसन्नता उस स्तर तक पहुँची है या नहीं, जिस स्तर पर पहुँचने से उधार की बात की जा सके।
अतः शरीर खुजाते हुए उन्होंने एक और गोली दागा-
आजकल के छोकरे, विशेषकर वे खद्दर धारण करने वाले-
अचानक दत्त ने आईने को टेबल पर रख कर अपनी दृष्टि को विश्वास की तरफ घुमाया।
विश्वास की अन्तरात्मा धक् कर उठी।
दोनों आँखों से अँगारे बरस रहे थे।
यह क्या हुआ!
आँखों में जो भी हो, चेहरे पर दत्त की लेकिन मुस्कुराहट तैर गयी।
वे बोले, ”रुपये की जरुरत है क्या? आज मेरे हाथ में रुपये नहीं हैं विश्वास।
विश्वास मन मार कर रह गये।
लेकिन प्रकट रुप से वे बोले, ”नहीं, रुपये की जरुरत नहीं है।
कुछ देर पहलू बदलने के बाद वे उठ खड़े हुए- अब बैठना वृथा है।
रास्ता चलते हुए विश्वास सोचने लगे, दत्त आज नाराज क्यों हुए?

--दो--
कुछ देर बाद ही दत्त के बैठकखाने में बनर्जी वकील का आविर्भाव हुआ। उनके आगमन का कारण भी रुपया ही था। दत्त के वे भी रुपया उधार लेने आये थे। अचानक जरुरत पड़ गयी थी।
वकील होने पर भी बनर्जी स्पष्टवक्ता थे- सीधे-सादे व्यक्ति।
दर्पण-हस्त गुम्फ-चयन-निरत दत्त से वे बोले, ”अरे इन्हें तोड़ कर क्या इनसे पार पा सकेंगे? इससे तो अच्छा है कि इन्हें सफाचट कर डालिये।
दत्त ने कोई प्रतिवाद नहीं किया।
प्रतिवाद करना उनके स्वभाव के विरुद्ध था। जो भी जो कुछ भी बोलता है, उसे सुनते थे, जो स्मरण योग्य लगता था, उसे मन में रखते थे, बाकी को दूसरे कान से निकाल देते थे। सीधा हिसाब। तर्क करके क्या लाभ?
बनर्जी ने काम की बात कही-
पाँच सौ रुपये उधार मिल जायेंगे? हैण्डनोट लिख दूँगा, सूद भी दूँगा-
दत्त महाशय सूदखोर हैं, इस कारण ही धनी हैं।
अतः निस्संकोच मृदु हँसी हँसकर बोले, ”कितना सूद दीजियेगा?“
जितना माँगिये। महीने भर के अन्दर चुका दूँगा।
दत्त महाशय ने आईने को टेबल पर रख कर भ्रुकुञ्चित कर प्रश्न किया, ”अच्छा, एक लड़की को लेकर स्टेशन के नये छोटे बाबू के खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज हुआ है क्या? पता है आपको?“
हाँ, पता है मतलब- मैं ही तो वकील था रेल की तरफ से। मामला कुछ नहीं है, एक बाईजी और उसके साथ उसका सारंगीवाला, दोनों बेटिकट जा रहे थे- छोटे बाबू ने उन्हें पकड़ कर उनका चालान कर दिया। लड़का काफी ऑनेस्ट है। और कोई होने पर दो-चार पैसे लेकर छोड़ देता।
दत्त फिर आईना लेकर मूँछ देखने लगे।
बनर्जी बोले, ”रुपये दे रहे हैं?“
अभी चाहिए?“
मिल जाने से ठीक ही रहता-
दत्त ने तत्क्षणात् कमर से चाभियों का गुच्छा निकाल कर दीवार में चिने लोहे का सन्दूक खोल कर पाँच सौ का नोट निकाला और मृदु हँसी हँस कर बोले, ”हैण्डनोट-फैण्डनोट देना है तो दे दीजिये- सूद आपको नहीं देना होगा। इस थोड़े-से रुपये के लिए बामन से फिर सूद लूँगा- वह भी महीने भर के लिए?“
बहुत-बहुत धन्यवाद।
बनर्जी चले गये।
वे भी रास्ता चलते हुए सोचने लगे, दत्त आज अचानक इतने दरियादिल कैसे हो गये?

--तीन--
आधुनिक लड़कों की निन्दा करने से दत्त खुश होते थे, लेकिन विश्वास आज दत्त को खुश नहीं कर पाये। बनर्जी की स्पष्टवादिता के कारण वे बनर्जी से नाराज रहते थे, मगर आज उन्हीं पर प्रसन्न होकर उन्होंने बिना सूद, बिना हैण्डनोट के ही उन्हें रुपये दे दिये।
इसके पीछे कारण था।
मूल कारण- वही तीसरा विवाह।
स्टेशन के छोटे बाबू दत्त महाशय को अच्छे लगे थे। स्वजातीय हैं और उनका परिवार अदला-बदली विवाह के लिए राजी है, जानकर उन्होंने छोटे बाबू के पिता का पता ले लिया था। पत्र-व्यवहार के माध्यम से ही अपनी पुत्री के साथ छोटे बाबू का रिश्ता उन्होंने प्रायः तय कर लिया था। कुण्डली-मिलान हो गया था, लेन-देन भी प्रायः तय हो गया था। दत्त महाशय स्वभाव से अन्तर्मुखी थे, इसलिए गोपनीय तरीके से ही सब कर रहे थे। हठात् उस दिन स्टेशन की तरफ घूमने जाने के क्रम में उस बाईजी किस्म की औरत को देख कर दत्त महाशय के मन में भारी खटका लग गया था। लड़के का स्वभाव-चरित्र ठीक-ठाक है तो? आजकल के लड़के हैं, कुछ कहा भी नहीं जा सकता। देख कर तो लड़का भला ही लगता है।
चलो अब निश्चिन्त हुआ जा सकता है।
लड़के यानि छोटे बाबू के पिता को उन्होंने पत्र लिखा कि वे अविलम्ब आकर कन्या को देखकर आशीर्वाद कर जायें। ओह, विश्वास ने तो सिर ही घुमा दिया था!
पत्र लिखने के बाद दत्त महाशय ने फिर दर्पण हाथ में उठा लिया और भौंहों को सिकोड़ कर मूँछों को देखने लगे। कुछ देर देखने के बाद दर्पण रख कर पंजिका (पुस्तकाकार बँगला पञ्चाङ्ग) खोलकर उसके पन्ने पलटने लगे। एक पन्ने पर आकर उनकी दृष्टि स्थिर हुई और उस पन्ने से पता लेकर एक और पत्र उन्होंने लिख डाला। पत्र समाप्त कर बुदबुदाते हुए अपने आप से ही वे बोल पड़े, ”पैसे की चिन्ता करने से नहीं चलेगा, चौपट हो जायेगा सब-
दूसरा पत्र लिखा उन्होंने बाल काला करने वाला कलप मँगवाने के लिए।
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35. मिस्टर मुखर्जी

मिस्टर मुखर्जी कब जो हमारे अड्डे में आकर शामिल हो गये थे , ठीक से याद नहीं। सिर्फ इतना ही याद है कि स्वर्गीय मधु मामा एक दिन उनको ह...