रविवार, 22 जनवरी 2017

28. परीकथा



सुन्दर ज्योत्स्ना।
चारों तरफ जनमानस की आहट नहीं। गहन रात्रि। दूर से नदी की कल-कल ध्वनि तैरती आ रही है। निर्जन प्रान्त में अकेला खड़ा हूँ। स्वप्न-विह्नल नेत्रों से देख रहा हूँ- ज्योत्स्ना में सारा संसार डूबा जा रहा है। कुत्सित वस्तुएं भी सुन्दर हो उठी हैं। वह कचरे का डिब्बा भी मानो जरीदार कपड़े पहनकर मोहिनी सज गयी हो। आकाश के काले बादलों में भी रूपहला आवेश है। 
निर्जन प्रान्त में अकेला खड़ा हूँ। उसी की प्रतीक्षा में। उसी की प्रतीक्षा में इस गहन रात्रि की समस्त ज्योत्स्ना भी मानो परिपूर्ण हो उठी है। 
आ रही है। -हाँ, वही तो! सर्वांग में उसके है ज्योत्स्ना की आकुलता। उसके नुपूर के गुंजन से ज्योत्स्ना भी सिहर उठी है। ....वही तो, मेरी ओर देखकर मुस्कुरायी।
सहसा एक दुर्धर्ष दस्यु कहीं से भागा आया और उसने उस किशोरी के सीने में चाकू घोंप दिया। ज्योत्स्ना में रक्तरंजित चाकू चमक उठा! रक्त की धारा में ज्योत्स्ना डूब गयी।
ऊर्ध्वश्वांस से भागकर मैंने उस व्यक्ति को पकड़ा। पकड़कर देखा- यह क्या, यह तो मेरा ही विवेक है! 
--ः0ः--

सोमवार, 10 अक्तूबर 2016

27. सुलेखा का रोना

       सुलेखा रो रही है।
गहन रात्रि, बाहर चाँदनी छिटकी हुई है। ऐसी स्वप्नमयी चाँदनी में दुग्धफेनित बिस्तर पर औंधे मुँह लेटकर षोड़षी तन्वी बस रोये जा रही है। अकेले- कमरे में और कोई नहीं है। ज्योत्स्ना के एक टुकड़े ने खिड़की के रास्ते चुपके से कमरे में प्रवेश कर रखा है। प्रवेश करके इस व्यथातुरा अश्रुमुखी रूपसी को देख वह मानो ठिठक-सा गया है। क्यों यह क्रन्दन?
प्रेम? हो भी सकता है। इस ज्योत्स्ना-पुलकिता यामिनी में सुन्दरी षोड़षी के नयन-पल्लवों में अश्रुसंचार का कारण प्रेम हो ही सकता है। सुलेखा के जीवन में प्रेम एकबार आया चाहता ही था! तब उसका विवाह नहीं हुआ था। अरूणदा नामक युवक को वह मन-ही-मन श्रद्धा करती थी- अतीव संगोपन और मन में। यह श्रद्धा ही स्वाभाविक ढंग से प्रेम में परिणत हो सकता था, किन्तु सामाजिक नियमों ने इसमें बाधा डाल दी। सामाजिक नियमों के अनुसार अरूणदा नहीं, विपिन नाम के एक व्यक्ति के लोमश गले में सुलेखा ने वरमाला अर्पण किया। 
हो सकता है, इस गहन रात्रि में ज्योत्स्ना के आवेश में उसी अरूणदा की बार-बार याद आ रही हो। निर्जन शैया पर उसी की याद में सम्भवतः यह अश्रुतर्पण है! वैसे, यह भी सच है कि अपने गोपन हृदय की भीरू वार्ता को उसने कभी अरूणदा को बताया नहीं था। मन-ही-मन उसके अन्दर जो आग्रह और आकांक्षा जाग उठी थी, विवाह के बाद धीरे-धीरे काल के अमोघ नियमानुसार, वह अपने-आप ही बुझ गयी थी।
विपिन हालाँकि अरूणदा नहीं है, किन्तु विपिन विपिन है- एकदम खांटी विपिन। और आश्चर्य का विषय होने पर भी यह बात सत्य है कि विपिन के विपिनत्व को सुलेखा ने प्यार भी किया था। प्यार करके सुखी भी हुई थी। सहसा आज इस निशीथ में उसी विस्मृतप्राय अरूणदा को याद करके पलकें सजल हो उठेंगी, सुलेखा का मन क्या इतना अतीत-प्रवण है?
हो सकता है। नारी का मन विचित्र होता है। उसका मनस्तत्व भी अद्भुत है। इस सम्बन्ध में चट्-से कोई मन्तव्य कर बैठना मैं उचित नहीं मानता। वस्तुतः स्त्री जाति के सम्बन्ध में किसी भी तरह का मन्तव्य करना ही दुस्साहस का कार्य है। जिस रमणी को देखकर लगा, उम्र उन्नीस-बीस होगी, अनुसन्धान करने पर पता चला, उसकी उम्र है- पैंतीस। एतद्नुसार, सावधानी का अवलम्बन करते हुए पुनराय किसी की उम्र का जब अनुमान लगाया पच्चीस, तो प्रमाणित हुआ, उसका वयःक्रम पन्द्रह वर्ष से एक मिनट भी अधिक नहीं है।
अतएव नारी-संक्रान्त किसी मामले में बेवकूफ की तरह फस्स-से कुछ एक बोल बैठना ठीक नहीं है। सर्वदा भद्रता का पालन करना ही संगत है। यही सार मैंने समझा है और इसलिए सुलेखा के क्रन्दन के सम्बन्ध में तुरन्त कुछ नहीं बोलूँगा। कारण मैं नहीं जानता। इस क्रन्दन के जितने शोभन एवं संगत कारण सम्भव हैं, उन्हीं को विवृत कर रहा हूँ।
गहन रात्रि में अकेले कमरे में एक युवती शैया पर लेटकर क्रमागत रो रही है- यह एक डिटेक्टिव उपन्यास के प्रथम परिच्छेद का विषय भी हो सकता है। किन्तु हमलोग विश्वस्त सूत्र से अवगत हुए हैं, ऐसा नहीं है। पाठक-पाठिकागण भी इस विषय में अन्ततः निश्चिन्त हो लें। विपिन व सुलेखा को जहाँ तक जानता हूँ, उस हिसाब से, मुझे नहीं लगता कि उनमें डिटेक्टिव उपन्यास के नायक-नायिका होने की योग्यता है।
अरूणदा की बात अगर छोड़ दी जाय, तो सुलेखा के क्रन्दन की एक और सम्भावना मुझे नजर आ रही है। कुछ दिनों पूर्व सुलेखा की एक सन्तान हुई थी। उसकी प्रथम सन्तान। दो माह पूर्व वह अचानक डिप्थिरिया से चल बसी। हो सकता है, उसी शिशु का चेहरा सुलेखा के जननी हृदय को रुला रहा हो। शिशु की मृत्यु के बाद सुलेखा को दो बार फिट (बेहोशी) का दौरा पड़ा था- यह तो हमलोग विश्वस्त सूत्र से जानते ही हैं। जो चिरकाल के लिए खो गये हैं, उन्हें क्षणभर के लिए भी फिर से पाने की आकुलता कठोर पुरूषों के मन में भी कभी-कभी उठती है। कोमल-हृदया रमणी के अन्तःकरण में ऐसा होना तनिकमात्र भी विचित्र नहीं है। क्रन्दन का कारण पुत्रशोक हो सकता है। अवश्य ही हो सकता है।
किन्तु हाँ, एक और कारण भी तो हो सकता है। पुत्रशोक-प्रसंग के बाद यह बात कह रहा हूँ, सो आपलोग क्षमा कीजियेगा; किन्तु सुलेखा के क्रन्दन के पीछे की इस तुच्छ सम्भावना की मैं उपेक्षा नहीं कर सका। विगत कई दिनों से एक नामी फिल्म स्थानीय सिनेमा हॉल में चल रही है। अड़ोस-पड़ोस के प्रायः सभी नर-नारी सदल-बल जाकर उस फिल्म को देख आये हैं और उच्छ्वसित होकर प्रशंसनीय वाक्य उच्चारण कर रहे हैं। लेकिन विपिन ऐसा ही बे-रसिक व्यक्ति है कि सुलेखा के बारम्बार अनुरोध के बाद भी वह सुलेखा को उक्त फिल्म दिखलाने नहीं ले गया। प्रांजल भाषा में उसने प्रत्याखान कर दिया। सुलेखा को जो भी अच्छा लगता है, प्रायः देखा जाता है कि विपिन को उससे क्रोध आता है। आश्चर्य व्यक्ति है यह विपिन! अभी कुछ क्षणों पहले ही सिनेमा का लास्ट शोछूटा। सुलेखा के शयनकक्ष के वातायन के नीचे से ही सिनेमा हॉल जाने का रास्ता है। दर्शकों का दल इसी रास्ते से सोल्लास कोलाहल करते हुए घर लौटा। शायद इसी से सुलेखा का सिनेमा-शोक उभर आया है। लेकिन वह अकेली क्यों है? विपिन कहाँ है? वह क्या द्रवित होकर इस गहन रात्रि में ही कल के लिए सीट-बुककरने चला गया है?
हो सकता है। तरूणी पत्नी का मन रखने के लिए मनुष्य कुछ भी कर सकता है। विपिन लोमश है तो क्या, है तो वह मनुष्य ही! इसके अलावे, विपिन सुलेखा को सचमुच प्यार करता है- यह भी हमलोग विश्वस्त सूत्र द्वारा अवगत हैं। कारण हमलोग- लेखकगण- बहुत-सी बातों को विश्वस्त सूत्रों के द्वारा ही जानतेे हैं। अतः इस क्रन्दन का सिनेमा-घटित होना जरा भी असम्भव नहीं है।     सबकुछ सम्भव है। वास्तव में, जितना सोच रहा हूँ, उतना ही मुझे विश्वास हो रहा है कि सुलेखा के क्रन्दन का हेतु कुछ भी हो सकता है। यहाँ तक कि आज ही सन्ध्याकाल में सामान्य एक साड़ी का पाड़ (बॉर्डर) पसन्द करने के सम्बन्ध में सुलेखा के साथ विपिन का घोर मतभेद हो गया है। रुढ़भाषी पुरूषलोग साधारणतया जो करते हैं, विपिन ने वही किया है। गले की जोर से- अर्थात् डाँट-डपट करके, जीत गया है। मृदुभाषिणी तरूणीगण साधारणतया जो उपाय करके जीतती हैं, सुलेखा ने सम्भवतः उसी का अवलम्बन किया है- अर्थात् रो रही है।
कारण जो भी हो, घटना निस्सन्देह करूण है। रात्रि के गहन एवं ज्योत्स्ना के मनोहारिणी होने से और भी करूण- अर्थात् करूणतर। कोई सहृदय पाठक किंवा पाठिका यदि इसे करूणतम भी कहें, तो भी मेरे पास प्रतिवाद करने के लिए कुछ नहीं रहेगा। कारण, सुलेखा तरूणी हैं। रात्रि कितनी भी निबिड़ एवं ज्योत्स्ना कितनी भी आकाशप्लाविनी क्यों न हो, इस सम्बन्ध में हमलोग खूब सम्भवतः एकमत हैं कि इस आधी रात में एक बालक अथवा एक बुढ़िया के रोने से हमलोग इतना आर्द्र नहीं होते; इसके विपरीत, शायद विरक्त ही होते।
सुलेखा किन्तु तरूणी हैं। मन अतः द्रव हो गया है और इस बात को अस्वीकार करने का उपाय नहीं है कि सुलेखा के क्रन्दन का कारण निर्णय करने तक शान्ति नहीं मिल रही है। यहाँ तक कि अरूणदा को लेकर एक सस्ते किस्म का काव्य लिखने के लिए भी मन उत्सुक हो उठा है। मन कह रहा है, "क्यों नहीं! ऐसी चाँदनी रात में कैशोर्य का वह अर्द्ध-प्रस्फुटित प्रणय-प्रसून सहसा पूर्ण-प्रस्फुटित क्या नहीं हो सकता? वही तो दूर में चकोर का वह व्याकुल पुकार चल रहा है- पीऊ कहाँ? सामने बाग में रजनीगन्धा भी स्वप्न-विह्नल हो रहे हैं। चारों तरफ ज्योत्स्ना का आँचल पसरा है। ऐसे दुर्लभ क्षण में अरूणदा की याद आ जाना क्या असम्भव है, न अपराध?"
मन के वक्तव्य को विराम देते हुए दरवाजा खुला। अस्त-व्यस्त विपिन ने प्रवेश किया। चेहरे पर शंका की छाया। सम्भवतः सिनेमा का टिकट नहीं मिला। लेकिन यह क्या?          
विपिन ने पूछा, "दाँत का दर्द घटा?"
"नहीं, तेज दर्द हो रहा है।"
"यह पुड़िया खा लो तब। डाक्टर बाबू ने कल सुबह आने को कहा है। रोने से क्या होगा? यह खाते ही ठीक हो जायेगा। खा लो, प्रिये!"
ज्योत्स्ना का टुकड़ा चुपके-चुपके हँस रहा है।
देखा? मैंने कहा था न, कुछ भी सम्भव है!

***

बुधवार, 13 जुलाई 2016

26. अन्दर व बाहर


हमलोगों का मन साधरणतया दो भागों में विभक्त होता है। एक भाग बाहर का, दूसरा अन्दर का। मन का जो हिस्सा बाहर का है, वह भद्र, सामाजिक और सभ्य होता है। अन्दर का मन लेकिन हमेशा सभ्य एवं सामाजिक नहीं रहता, उसका चाल-चलन, उसकी विचार-प्रणाली विचित्र है। बाहर वाले मन का क्रिया-कलाप देखकर अन्दर वाला मन कभी हँसता है, कभी रोता है और कभी राय देता है। दोनों हिस्सों का आपसी कलह भी नित्यनैमित्रिक है।
रामकिशोर बाबू का अन्दर वाला मन लम्बे समय से मृतप्राय है। बाहर वाले मन के अत्याचारों ने उसे जर्जर कर दिया है। रामकिशोर बाबू वकील हैं। खूनी को बचाने के लिए झूठी गवाही गढ़ने का प्रयास, बड़े जमीन्दारों की तरफ से गरीब प्रजा का सर्वनाश-साधन, जाली वसीयत बनाने का परामर्शदान, इत्यादि सभी कार्यों के लिए वे बाहर वाले व्यवहारिक मन की सहायता लेते रहे थे। अन्दर वाले मन ने शुरू-शुरू में तीव्र प्रतिवाद करके बहुत अनर्थ सृष्टि किया था; आजकल अब वह कुछ नहीं बोलता।
उसदिन सुबह रामकिशोर बाबू अपने केशविरल मस्तक पर हाथ फेरते हुए बाग में चहलकदमी कर रहे थे। एक विधवा की सम्पत्ति से सम्बन्धित एक मामला उन्हें कुछ दिनों से विव्रत कर रहा था। आज केस कोर्ट में जायेगा, इसलिए वे जरा उद्विग्न थे।
इसी समय एक प्रौढ़ सज्जन ने आकर नमस्कार कर बताया कि वे किसी विषय में परामर्श लेना चाहते हैं। रामकिशोर बाबू उस सज्जन को पहचानते नहीं थे। अतः निस्संकोच बोले, ”कोई कानूनी सलाह देने पर मैं फी लेता हूँ, यह आप जानते हैं तो?“
जी हाँ, कितना देना पड़ेगा आपको?“
बत्तीस रुपये।
जी, बहुत अच्छा।“               
दोनों बैठकखाने में जाकर बैठे।
आगन्तुक बोले, ”मेरे एक आत्मीय हैं, उनके एकमात्र लड़के का विवाह हुए प्रायः दस साल हो गये हैं। सन्तानादि आज तक नहीं हुए हैं। सम्भावना भी कम है।
डॉक्टर को दिखाया था?“
हाँ, उनका भी कहना है कि बच्चा होना मुश्किल है।
लड़का स्वास्थ्यवान तो है?“
हाँ, लड़के में कोई दोष नहीं है।
मुझसे आप किस विषय में परामर्श चाहते हैं?“ कहकर रामकिशोर बाबू ने नस्सीदानी से नस्सी की एक खुराक निकाली।
इस सम्बन्ध में आपसे सिर्फ इतना ही जानना है कि यदि वंशलोप ही हो जाय, तो अन्त में सम्पत्ति का हकदार कौन होगा?“
नस्सी की खुराक को नासारंध्र से खींचकर रामकिशोर बाबू बोले, ”लड़का जब स्वास्थ्यवान है, तो वह स्वछन्दता से दूसरा विवाह कर सकता है। हिन्दू लॉ के अनुसार, इसमें कोई बाधा नहीं है।
सो तो खैर, नहीं ही है। लेकिन कानूनी बाधा न होने पर भी हर वक्त क्या हर चीज करना सम्भव है?“
रामकिशोर बाबू जरा हँसकर बोले, ”सेण्टीमेण्ट के साथ चलने से दुनिया में क्या चला जा सकता है महाशय? वो सब फालतू सेण्टीमेण्ट के कारण ही तो हम आज डूबने जा रहे हैं।
रामकिशोर बाबू ने भावुकता की अपकारिता पर नातिदीर्घ एक वक्तृता दे डाला। बाहर वाले मन ने उन्हें तर्क एवं वक्तव्य प्रदान किया। अन्दर वाला मन निर्वाक् रहा।
इस पर आगन्तुक ने कहा, ”मान लीजिये कि वे लोग लड़के का दूसरा विवाह नहीं करते हैं, तब सम्पत्ति किसे मिलेगी?“
कानून के अनुसार जो-जो उत्तराधिकारी हो सकते हैं, रामकिशोर बाबू उन सबके नाम एक साँस में बोल गये। 
अन्त में अपना निजी मत वे दुहराना वे नहीं भूले, ”लड़के का दूसरा विवाह करा दीजिये महाशय। बाँझ पत्नी को लेकर गृहस्थी सुखी थोड़े ही होगी? बाल-बच्चे न रहे, तो गृहस्थी श्मशान है। मैंने महाशय, जो उचित समझा, वह आपको बता दिया- आपके सेण्टीमेण्ट को चोट पहुँची हो, तो माफी माँगता हूँ।
आगन्तुक बोले, ”नहीं-नहीं, बिलकुल नहीं। आप स्पष्टवादी हैं और मुवक्किल के सच्चे हितैषी हैं- यह सुनकर ही तो आपके पास आना हुआ है।
बत्तीस रुपये देकर सज्जन ने विदा ली।

चार-पाँच दिनों के बाद एकदिन एक गाड़ी आकर रामकिशोर बाबू के घर के सामने रूकी। गाड़ी से एक युवती उतरकर अन्दर चली गयी।
रामकिशोर बाबू विधूर हैं। घर में महाराज-नौकरों की गृहस्थी चलती है। दोपहर में वे सब भी नहीं हैं- सिर्फ एक छोकरा-सा नौकर था। रामकिशोर बाबू कोर्ट गये हुए थे। नौकर ट्रंक-बिस्तर वगैरह उतारकर अन्दर ले गया। ट्रंक पर नाम लिखा था- सरोजिनी देवी
व्यवहार से पता चला, छोकरा नौकर सरोजिनी देवी को पहचानता नहीं था। इसके अलावे युवती के हाव-भाव से वह आश्चर्य में पड़ गया।
अन्दर वाले बरामदे पर बॉक्स-बिस्तरबन्द रखकर सरोजिनी ने नौकर से एकबार पूछा, ”बाबू कहाँ हैं?“
कचहरी में।
कब तक लौटेंगे?“
पता नहीं।
वे बरामदे में अपने बक्से पर बैठी रहीं।

रामकिशोर बाबू कोर्ट से लौटकर अवाक रह गये, ”यह क्या सरो, तुम अचानक बिना खबर किये आ गयी?“
उस घर में अब रहना अब सम्भव नहीं है।
क्यों बात क्या है?“
रामकिशोर बाबू बेटी के व्यवहार से क्रमशः विस्मित हो रहे थे।
रहना सम्भव नहीं है, क्या मतलब है?“          
वे लोग उनकी दूसरी शादी करने जा रहे हैं। आपने भी सहमति दी है।
मैंने सहमति दी- क्या मतलब?“
उनलोगों ने एक अपरिचित व्यक्ति को आपके पास भेजकर आपका सही मत ले लिया है। आपने शायद कहा है- लड़के का विवाह कर देना ही ठीक रहेगा!
रामकिशोर बाबू के नेपथ्यवासी भीतर वाले मन ने अब बाहर वाले मन की गर्दन धर दबोची।  
अचम्भित रामकिशोर बाबू अपनी एकमात्र कन्या के चेहरे की तरफ असहाय भाव से देखते रहे।
सरोजिनी ने पूछा, ”आपने सही में ऐसा कहा है पिताजी?“

--ः0ः--

रविवार, 17 अप्रैल 2016

25. युगल स्वप्न

     
कलाकृति: जयचाँद दास


सुधीर आया है। उसके हाथ में रजनीगन्धा का एक फूल है- डण्ठल सहित। आँखों में चमक, होंठों पर मुस्कान। उसका दिल मानों पंख फैलाकर उड़ जाना चाहता है।
सुधीर आते ही बोला, ‘‘हासि, आज एक बहुत ही अच्छी खबर है। क्या दोगी बोलो। वर्ना नहीं बताऊँगा।’’ 
               हासि बोली, ‘‘बताईये न क्या है?’’ 
               ‘‘पहले बताओ, मुझे क्या दोगी?’’
 ‘‘मैं भला क्या दे सकती हूँ? अच्छा, आपके रुमाल में एक बहुत ही खूबसूरत एम्ब्रॉयडरी बना दूँगी। एक अनोखा पैटर्न मिला है।’’
               ‘‘नहीं, इसमें मैं राजी नहीं हूँ।’’ 
 ‘‘फिर क्या चाहिए आपको? चॉकलेट है, वह दे सकती हूँ।’’
               ‘‘मैं क्या छोटा बच्चा हूँ, जो चॉकलेट से मान जाऊँगा?’’ 
               हासि हँस पड़ी, बोली, ‘‘फिर मैं सुनना नहीं चाहती, जाईये। कह रही हूँ कि एम्ब्रॉयडरी बना दूँगी, चॉकलेट देने के लिए राजी हूँ, इसमें भी जब आप- ’’ 
 सुधीर बोला, ‘‘फिर चला मैं।’’ 
               हासि ने फिर पुकारा, ‘‘तो आप नहीं ही बताईयेगा?’’ 
 ‘एक चीज पाने से बता सकता हूँ। वही... जो उस दिन माँगा था।- ’’ कहकर अर्थपूर्ण दृष्टि से हासि के चेहरे को देखकर वह हँसा। 
हासि अचानक लजाकर फिर सम्भल गयी। बोली, ‘‘मैंने कहा था न आपको- वह नहीं हो सकता।’’ 
लेकिन सुधीर के चेहरे की तरफ देखकर वह डर गयी। उसने सुना, सुधीर कह रहा था- ‘‘सोचा था, इस बात को छोटी-सी हँसी-मजाक के बीच कहूँगा। लेकिन नहीं सका। मुझे माफ करना। मैं सुनकर आया हूँ कि तुम्हारी शादी साँतरागाछी के उस लड़के के साथ तय हो गयी है।’’ 
 कहकर सुधीर चला गया। 
                हासि ने पुकारा, ‘‘सुधीरदा, जरा सुनिये तो।’’ 
 सुधीर नहीं लौटा। 

--दो--
                अलका आयी है। 
                वही अलका, जिसे एकबार देखने के लिए अजय सारा दिन प्रतीक्षा करता था- कब शाम ढले और वह आये। 
                अलका आकर कह रही है, ‘‘अच्छा अजयदा, अँग्रेजी में पेट बोलकर कोई शब्द है क्या?’’ 
                अजय बोला, ‘‘हाँ है, ‘पेट मतलब सिर।’’
                ‘‘सच?’’ 
                ‘‘डिक्शनरी खोलकर देख लो- पेट माने सिर होता है।’’ 
                ‘‘इसका मतलब, हमारी वरूणादी ने ठीक ही कहा है!’’ 
                अजय बोला, ‘‘अच्छा, खोपड़ी की अँग्रेजी क्या है, बताओ तो?’’ 
                अलका पलकें झपकाकर बोली, ‘‘हेड।’’ 
 ‘‘हेड मतलब तो सिर होता है।’’ 
                ‘‘खोपड़ी मतलब भी तो सिर होता है।’’
                अजय हँसकर बोला, ‘‘तो यही है तुम्हारा बँगला भाषा का ज्ञान! सिर और खोपड़ी भला एक ही चीज है!’’ 
                अलका हँसकर बोली, ‘‘फर्क क्या है?’’ 
                अजय गम्भीर होकर बोला, ‘‘फिर तो कहो कि तुममें और उस पाँची धोबन में कोई फर्क नहीं है- दोनों नारी हैं।’’ 
                अलका पूछ बैठी, ‘‘यह पाँची धोबन कौन है?’’ 
                ‘‘यहीं तुम्हारी गली की मोड़ पर धोबी की एक लड़की है। उम्र कम है- तुम्हारी जितनी होगी।’’ 
                वक्र हँसी हँसकर अलका बोली, ‘‘आजकल देख रही हूँ अजयदा ने हर चीज पर गौर करना शुरु कर दिया है- धोबन तक को नहीं छोड़ते!’’ 
                अजय बोला, ‘‘क्यों नहीं। अपनी चीज अच्छी है, यह तो जाँचकर देखना होगा न?’’ 
                ‘‘कौन है आपकी अपनी चीज?’’ 
 ‘‘है एक।’’ 
                अचानक अन्यमनस्क होकर अलका पास की मेज सँवारने लगी। 
                अजय अकारण ही खिड़की से बाहर देखने लगा। 

 ***
                दो स्वप्न दोनों देख रहे हैं। 
                अत्यन्त घनिष्ठ भाव से दोनों पास-पास सोये हुए हैं। 
                हासि का हाथ अजय के सीने पर है। 
                हासि और अजय- पति-पत्नी हैं।
--0ः--