22. लव-मैरिज (अनिर्वचनीय)

कलाकृति: जयचाँद दास 

क्षणिका खास्तगीर के सर पर वज्रपात हुआ है। अभी तक वह मरी तो नहीं है, लेकिन इस अवस्था में मरना उचित है कि नहीं, और उचित होने पर सहज एवं मर्मान्तिक मृत्यु का उपाय क्या है- यही अच्छी तरह विचारने के लिए वह छत पर चहलकदमी कर रही थी। किरासन तेल, गले में रस्सी, तालाब में डूबना, यहाँ तक कि cyanide भी मामूली हो गया है। यक्ष्मा का जीवाणु सूँघना कैसा रहेगा?
अचानक पीछे से रमेशबाबू की चप्पलों की आवाज।
‘‘क्षुणू, तुम यहाँ हो? कमाल है! अच्छा, यह क्या बचपना है बताओ तो तुम?’’
क्षणिका ने कुछ नहीं कहा।
रमेशबाबू ने कहा, ‘‘कुछ कहती क्यों नहीं? मैं क्या अभी ही तुम्हारी शादी उससे किये दे रहा हूँ? एकबार सोचकर देखने में हर्ज क्या है?’’
क्षणिका ने कहा, ‘‘पिताजी, आप आखिरकार मुझे एक विधुर के हाथों सौंप देंगे- यह तो मैं सोच भी नहीं सकती।’’
रमेशबाबू ने कहा, ‘‘अच्छी बात है, मत करो उससे शादी। मुझे लड़का अच्छा लगा, इसलिए मैं कह रहा था। विद्वान है, बड़ी नौकरी करता है, स्वास्थ्यवान है, बच्चे हैं नहीं। दूसरी शादी होने से क्या हुआ? ठीक है बेटे, तुम्हें पसन्द नहीं है, तो मत करो उससे शादी। चलो, अब सो जाओ। तुमलोगों ने पढ़ाई करके अपने टौन्सिल बढ़ाये हैं, बुद्धि नहीं बढ़ी कुछ।’’
मातृभावापन्न रमेशबाबू अपनी मातृहीन कन्या को लेकर नीचे उतर गये।
बताना भूल गया- पहले ही बताना उचित था- क्षणिका खास्तगीर ने अँग्रेजी में ऑनर्सके साथ बी.ए. पास किया है। एक प्रमुख मासिक पत्रिका में उसकी तस्वीर छप चुकी है।
क्षणिका ने अगले दिन बान्धवी सुजाता को बताया, ‘‘चलो बला टली। उस आदमी के अक्ल की मैं दाद देती हूँ। पत्नी के मरते ही शादी की जल्दी पड़ गयी है। पुरूषों ने तो हमें सिगरेट ही बना डाला है। एक के बुझते-न बुझते दूसरा जला लेना है। ये सज्जन तो और भी जल्दबाज हैं। मानो पहली पत्नी की चिता की आग से ही दूसरे विवाह के होम की अग्नि जला लेना चाहते हों!’’
सुजाता ने पूछा, ‘‘मामला क्या है? कौन हैं ये सज्जन?’’
क्षणिका ने उत्तर दिया, ‘‘जनाब का नाम है अजय कुमार बोस। सरकारी नौकरी करते हैं- कविता भी लिखते हैं। काव्यरस की मात्रा कुछ ज्यादा ही- ’’
सुजाता बोसी, ‘‘ऐसी बात है?’’
क्षणिका की उत्तेजना तब भी कम नहीं हुई थी। वह बोलती रही, ‘‘मेरे विचार से तो कानून बनाकर ऐसी शादियों पर पाबन्दी लगा देनी चाहिए।’’
सुजाता ने कुछ नहीं कहा।
सुजाता ने भले उस वक्त कुछ नहीं कहा, लेकिन इस मामले में अपना कानून ज्ञान उसने हाथों-हाथ दिखा दिया। महीने भर के बाद आयुष्मती सुजाता के साथ अजय बोस के शुभ विवाह का निमंत्रण पत्र परिचितों के बीच वितरित होने लगा।
               
सहेली का पति है। बातचीत तो होनी ही थी। एक दिन बातों-बातों में हँसते हुए क्षणिका ने अजय बाबू से कहा, ‘‘बचपन में आपने ट्राय-ट्राय अगेनकविता अच्छी तरह से पढ़ी थी, क्यों?’’
अजय बाबू बोले, ‘‘सो तो पढ़ी ही थी। इसके अलावे, पता है- पहली पत्नी की मृत्यु के बाद बड़े-बड़े लोग आकर दिन-रात अनुरोध करने लगे- क्या करता मैं बताईये। अपनी जरुरत तो खैर थी ही-’’
क्षणिका ने विस्मित होकर पूछा, ‘‘बड़े-बड़े लोग मतलब?’’
‘‘यूँ समझिये, दो पत्नियों के स्वामी याज्ञवल्क्य से लेकर शेली, बायरन, मोपासाँ, रवीन्द्रनाथ, सबका समवेत अनुरोध; यहाँ तक कि हमारे सत्येन्द्र दत्त भी बोले-
कौन गया है कौन जायेगा और
इतना सब सोचने का
                फुर्सत नहीं आज- नहीं है मित्र!
‘‘और वो उमर खैय्याम- आपने जो शादी में उपहार दिया था- वे तो पीछे ही पड़ गये थे। अब जरा सोचकर देखिये, शराफत के साथ इतने सारे लोगों के अनुरोध का मान रखने के लिए मेरे-जैसे नाचीज के सामने शादी करने के अलावे और क्या चारा था?’’
आरक्तिम-कर्णमूल होकर क्षणिका ने कहा, ‘‘बस-बस, रहने दीजिये। समझ गयी आपलोगों को।’’
लेकिन अजय के सप्रतिभ, सरस उत्तर को मन-ही-मन उपभोग किये बिना वह नहीं रह सकी। बेशक, आदमी रसिक है- सुजाता सुखी रहेगी।

 कुछ दिनों बाद सुनने में आया, सुजाता ने आत्महत्या कर ली है; और इसके भी कुछ दिनों बाद सुना गया, अजय बाबू फिर विवाह करने जा रहे हैं और इस बार क्षणिका खास्तगीर के साथ- लव मैरिज’!

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