23. तर्क व स्वप्न

तर्क चल रहा था।
                प्रथम तार्किक प्राणी कह रहा था, ‘‘मांस को पहले भूनकर फिर पकाने से सुस्वादु बनता है।’’
                दूसरे ने तुरन्त प्रतिवाद किया, ‘‘मांस को पहले भून लेने से उसका पकना कठिन हो जाता है। इसलिए पहले अच्छी तरह मांस को पकाकर फिर तरी को सूखाकर भुना-भुना-सा बना लेना अच्छा रहता है। तुम नहीं जानते।’’
                ‘‘मैं नहीं जानता! मांस को पहले भूनना ही चाहिए, मसाला भी भूनना चाहिए। पाक-प्रणाली में ऐसा लिखा है।’’
                ‘‘पाक-प्रणाली की बात रहने दो। बड़े-बड़े बावर्चियों के मँुह से मैंने सुना है, मांस को पहले पका- ’’
                ‘‘पाक-प्रणाली की बात तुम नहीं मानना चाहते?’’
                ‘‘नहीं!’’
                ‘‘क्यों? कारण जान सकता हूँ?’’
                ‘‘कारण विभिन्न पाक-प्रणालियों के विभिन्न मत होते हैं। इसलिए बावर्ची- अर्थात् जो रोज मांस पकाते हैं- उनकी बात ही प्रामाण्य है।’’
                प्रथम तार्किक कुछ देर के लिए निरुत्तर हुआ, लेकिन तुरन्त उसकी बुद्धि खुली।
                ‘‘सभी बावर्ची भी तो हमेशा एकमत नहीं होते हैं।’’
                ‘‘जो बावर्ची मांस पहले भूनना चाहते हैं, वे बावर्ची नहीं- बेवकूफ हैं। जापान में क्या करते हैं, पता भी है?’’
                प्रथम तार्किक का धैर्य चुक गया। वह बोला, ‘‘जापान-टापान मैं नहीं जानता। तुम बावर्ची का अपमान करने वाले कौन होते हो? अभद्र कहीं के!’’
                ‘‘क्या, जितना बड़ा मुँह नहीं, उतनी बड़ी बात! खुद तो दुनिया की कोई खबर नहीं रखेंगे और आ जायेंगे फदर-फदर करके तर्क करने! बेवकूफ!’’
                ‘‘फिर बेवकूफकहा?’’
                ‘‘बार-बार कहूँगा।’’
                ‘‘तो यह ले- ’’
                ‘‘यह ले- ’’
                तर्क युद्ध में परिणत हो गया।
                अनतिदूर बैठा एक शृगाल इस तर्क प्रगति को उपभोग कर रहा था; दोनों को समरोन्मुख देखकर हँसकर बोला, ‘‘पुंगद्वय, तुमलोग तो दोनों ही निरामिषभोजी हो। आमिष विषयक तर्क में लिप्त होकर निरर्थक गोलमाल दंगा क्यों कर रहे हो? तुम्हारे प्रभु जाग गये, तो मुश्किल में पड़ जाओगे।’’
                शृगाल की बात दोनों ने नहीं सुनी। परस्पर सींग में सींग फँसाकर घोर नाद के साथ दोनों युद्ध करने लगे।
                अचानक नीन्द से उठकर गाड़ीवान ने देखा, रात्रि के द्विप्रहर में उसके बलीवर्दयुगल आपस में लड़ रहे हैं। ऐसी युद्ध प्रचेष्टाओं को शान्त करने के सदुपाय से वह अविदित नहीं था। देशज एवं प्राकृत भाषा का प्रचुर व्यवहार उसने किया। इसके बाद दोनों बैलों को पृथक कर दूर-दूर बाँधकर उपसँहार में उसने कहा, ‘‘खाओ सालों, खाओ चुपचाप- ज्यादा गुण्डई मत करो।’’
                खाने के लिए थोड़ा पुआल उसने डाल दिया।


                अचानक मेरी भी नीन्द टूटी। स्वप्न भी। जो दो उग्र प्रकृति के युवक जापान-जर्मनी, हिटलर-मुसोलिनी प्रभृति विषयों को लेकर तर्क मुखर हो उठे थे, देखा, वे उतर गये हैं। ट्रेन नाथनगर में खड़ी थी।
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