27. सुलेखा का रोना

       सुलेखा रो रही है।
गहन रात्रि, बाहर चाँदनी छिटकी हुई है। ऐसी स्वप्नमयी चाँदनी में दुग्धफेनित बिस्तर पर औंधे मुँह लेटकर षोड़षी तन्वी बस रोये जा रही है। अकेले- कमरे में और कोई नहीं है। ज्योत्स्ना के एक टुकड़े ने खिड़की के रास्ते चुपके से कमरे में प्रवेश कर रखा है। प्रवेश करके इस व्यथातुरा अश्रुमुखी रूपसी को देख वह मानो ठिठक-सा गया है। क्यों यह क्रन्दन?
प्रेम? हो भी सकता है। इस ज्योत्स्ना-पुलकिता यामिनी में सुन्दरी षोड़षी के नयन-पल्लवों में अश्रुसंचार का कारण प्रेम हो ही सकता है। सुलेखा के जीवन में प्रेम एकबार आया चाहता ही था! तब उसका विवाह नहीं हुआ था। अरूणदा नामक युवक को वह मन-ही-मन श्रद्धा करती थी- अतीव संगोपन और मन में। यह श्रद्धा ही स्वाभाविक ढंग से प्रेम में परिणत हो सकता था, किन्तु सामाजिक नियमों ने इसमें बाधा डाल दी। सामाजिक नियमों के अनुसार अरूणदा नहीं, विपिन नाम के एक व्यक्ति के लोमश गले में सुलेखा ने वरमाला अर्पण किया। 
हो सकता है, इस गहन रात्रि में ज्योत्स्ना के आवेश में उसी अरूणदा की बार-बार याद आ रही हो। निर्जन शैया पर उसी की याद में सम्भवतः यह अश्रुतर्पण है! वैसे, यह भी सच है कि अपने गोपन हृदय की भीरू वार्ता को उसने कभी अरूणदा को बताया नहीं था। मन-ही-मन उसके अन्दर जो आग्रह और आकांक्षा जाग उठी थी, विवाह के बाद धीरे-धीरे काल के अमोघ नियमानुसार, वह अपने-आप ही बुझ गयी थी।
विपिन हालाँकि अरूणदा नहीं है, किन्तु विपिन विपिन है- एकदम खांटी विपिन। और आश्चर्य का विषय होने पर भी यह बात सत्य है कि विपिन के विपिनत्व को सुलेखा ने प्यार भी किया था। प्यार करके सुखी भी हुई थी। सहसा आज इस निशीथ में उसी विस्मृतप्राय अरूणदा को याद करके पलकें सजल हो उठेंगी, सुलेखा का मन क्या इतना अतीत-प्रवण है?
हो सकता है। नारी का मन विचित्र होता है। उसका मनस्तत्व भी अद्भुत है। इस सम्बन्ध में चट्-से कोई मन्तव्य कर बैठना मैं उचित नहीं मानता। वस्तुतः स्त्री जाति के सम्बन्ध में किसी भी तरह का मन्तव्य करना ही दुस्साहस का कार्य है। जिस रमणी को देखकर लगा, उम्र उन्नीस-बीस होगी, अनुसन्धान करने पर पता चला, उसकी उम्र है- पैंतीस। एतद्नुसार, सावधानी का अवलम्बन करते हुए पुनराय किसी की उम्र का जब अनुमान लगाया पच्चीस, तो प्रमाणित हुआ, उसका वयःक्रम पन्द्रह वर्ष से एक मिनट भी अधिक नहीं है।
अतएव नारी-संक्रान्त किसी मामले में बेवकूफ की तरह फस्स-से कुछ एक बोल बैठना ठीक नहीं है। सर्वदा भद्रता का पालन करना ही संगत है। यही सार मैंने समझा है और इसलिए सुलेखा के क्रन्दन के सम्बन्ध में तुरन्त कुछ नहीं बोलूँगा। कारण मैं नहीं जानता। इस क्रन्दन के जितने शोभन एवं संगत कारण सम्भव हैं, उन्हीं को विवृत कर रहा हूँ।
गहन रात्रि में अकेले कमरे में एक युवती शैया पर लेटकर क्रमागत रो रही है- यह एक डिटेक्टिव उपन्यास के प्रथम परिच्छेद का विषय भी हो सकता है। किन्तु हमलोग विश्वस्त सूत्र से अवगत हुए हैं, ऐसा नहीं है। पाठक-पाठिकागण भी इस विषय में अन्ततः निश्चिन्त हो लें। विपिन व सुलेखा को जहाँ तक जानता हूँ, उस हिसाब से, मुझे नहीं लगता कि उनमें डिटेक्टिव उपन्यास के नायक-नायिका होने की योग्यता है।
अरूणदा की बात अगर छोड़ दी जाय, तो सुलेखा के क्रन्दन की एक और सम्भावना मुझे नजर आ रही है। कुछ दिनों पूर्व सुलेखा की एक सन्तान हुई थी। उसकी प्रथम सन्तान। दो माह पूर्व वह अचानक डिप्थिरिया से चल बसी। हो सकता है, उसी शिशु का चेहरा सुलेखा के जननी हृदय को रुला रहा हो। शिशु की मृत्यु के बाद सुलेखा को दो बार फिट (बेहोशी) का दौरा पड़ा था- यह तो हमलोग विश्वस्त सूत्र से जानते ही हैं। जो चिरकाल के लिए खो गये हैं, उन्हें क्षणभर के लिए भी फिर से पाने की आकुलता कठोर पुरूषों के मन में भी कभी-कभी उठती है। कोमल-हृदया रमणी के अन्तःकरण में ऐसा होना तनिकमात्र भी विचित्र नहीं है। क्रन्दन का कारण पुत्रशोक हो सकता है। अवश्य ही हो सकता है।
किन्तु हाँ, एक और कारण भी तो हो सकता है। पुत्रशोक-प्रसंग के बाद यह बात कह रहा हूँ, सो आपलोग क्षमा कीजियेगा; किन्तु सुलेखा के क्रन्दन के पीछे की इस तुच्छ सम्भावना की मैं उपेक्षा नहीं कर सका। विगत कई दिनों से एक नामी फिल्म स्थानीय सिनेमा हॉल में चल रही है। अड़ोस-पड़ोस के प्रायः सभी नर-नारी सदल-बल जाकर उस फिल्म को देख आये हैं और उच्छ्वसित होकर प्रशंसनीय वाक्य उच्चारण कर रहे हैं। लेकिन विपिन ऐसा ही बे-रसिक व्यक्ति है कि सुलेखा के बारम्बार अनुरोध के बाद भी वह सुलेखा को उक्त फिल्म दिखलाने नहीं ले गया। प्रांजल भाषा में उसने प्रत्याखान कर दिया। सुलेखा को जो भी अच्छा लगता है, प्रायः देखा जाता है कि विपिन को उससे क्रोध आता है। आश्चर्य व्यक्ति है यह विपिन! अभी कुछ क्षणों पहले ही सिनेमा का लास्ट शोछूटा। सुलेखा के शयनकक्ष के वातायन के नीचे से ही सिनेमा हॉल जाने का रास्ता है। दर्शकों का दल इसी रास्ते से सोल्लास कोलाहल करते हुए घर लौटा। शायद इसी से सुलेखा का सिनेमा-शोक उभर आया है। लेकिन वह अकेली क्यों है? विपिन कहाँ है? वह क्या द्रवित होकर इस गहन रात्रि में ही कल के लिए सीट-बुककरने चला गया है?
हो सकता है। तरूणी पत्नी का मन रखने के लिए मनुष्य कुछ भी कर सकता है। विपिन लोमश है तो क्या, है तो वह मनुष्य ही! इसके अलावे, विपिन सुलेखा को सचमुच प्यार करता है- यह भी हमलोग विश्वस्त सूत्र द्वारा अवगत हैं। कारण हमलोग- लेखकगण- बहुत-सी बातों को विश्वस्त सूत्रों के द्वारा ही जानतेे हैं। अतः इस क्रन्दन का सिनेमा-घटित होना जरा भी असम्भव नहीं है।     सबकुछ सम्भव है। वास्तव में, जितना सोच रहा हूँ, उतना ही मुझे विश्वास हो रहा है कि सुलेखा के क्रन्दन का हेतु कुछ भी हो सकता है। यहाँ तक कि आज ही सन्ध्याकाल में सामान्य एक साड़ी का पाड़ (बॉर्डर) पसन्द करने के सम्बन्ध में सुलेखा के साथ विपिन का घोर मतभेद हो गया है। रुढ़भाषी पुरूषलोग साधारणतया जो करते हैं, विपिन ने वही किया है। गले की जोर से- अर्थात् डाँट-डपट करके, जीत गया है। मृदुभाषिणी तरूणीगण साधारणतया जो उपाय करके जीतती हैं, सुलेखा ने सम्भवतः उसी का अवलम्बन किया है- अर्थात् रो रही है।
कारण जो भी हो, घटना निस्सन्देह करूण है। रात्रि के गहन एवं ज्योत्स्ना के मनोहारिणी होने से और भी करूण- अर्थात् करूणतर। कोई सहृदय पाठक किंवा पाठिका यदि इसे करूणतम भी कहें, तो भी मेरे पास प्रतिवाद करने के लिए कुछ नहीं रहेगा। कारण, सुलेखा तरूणी हैं। रात्रि कितनी भी निबिड़ एवं ज्योत्स्ना कितनी भी आकाशप्लाविनी क्यों न हो, इस सम्बन्ध में हमलोग खूब सम्भवतः एकमत हैं कि इस आधी रात में एक बालक अथवा एक बुढ़िया के रोने से हमलोग इतना आर्द्र नहीं होते; इसके विपरीत, शायद विरक्त ही होते।
सुलेखा किन्तु तरूणी हैं। मन अतः द्रव हो गया है और इस बात को अस्वीकार करने का उपाय नहीं है कि सुलेखा के क्रन्दन का कारण निर्णय करने तक शान्ति नहीं मिल रही है। यहाँ तक कि अरूणदा को लेकर एक सस्ते किस्म का काव्य लिखने के लिए भी मन उत्सुक हो उठा है। मन कह रहा है, "क्यों नहीं! ऐसी चाँदनी रात में कैशोर्य का वह अर्द्ध-प्रस्फुटित प्रणय-प्रसून सहसा पूर्ण-प्रस्फुटित क्या नहीं हो सकता? वही तो दूर में चकोर का वह व्याकुल पुकार चल रहा है- पीऊ कहाँ? सामने बाग में रजनीगन्धा भी स्वप्न-विह्नल हो रहे हैं। चारों तरफ ज्योत्स्ना का आँचल पसरा है। ऐसे दुर्लभ क्षण में अरूणदा की याद आ जाना क्या असम्भव है, न अपराध?"
मन के वक्तव्य को विराम देते हुए दरवाजा खुला। अस्त-व्यस्त विपिन ने प्रवेश किया। चेहरे पर शंका की छाया। सम्भवतः सिनेमा का टिकट नहीं मिला। लेकिन यह क्या?          
विपिन ने पूछा, "दाँत का दर्द घटा?"
"नहीं, तेज दर्द हो रहा है।"
"यह पुड़िया खा लो तब। डाक्टर बाबू ने कल सुबह आने को कहा है। रोने से क्या होगा? यह खाते ही ठीक हो जायेगा। खा लो, प्रिये!"
ज्योत्स्ना का टुकड़ा चुपके-चुपके हँस रहा है।
देखा? मैंने कहा था न, कुछ भी सम्भव है!

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1 टिप्पणी:

  1. मर्मस्पर्शी प्रस्तुति ....
    आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

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32. विद्यासागर

विदा लेने से पूर्व विनम्र नमस्कार कर वे सज्जन बोले , ” उस मोड़ पर डिस्पेन्सरी खोला हूँ मास्साब , कभी पधारियेगा- “ ” अच्छा। “ .....