28. परीकथा



सुन्दर ज्योत्स्ना।
चारों तरफ जनमानस की आहट नहीं। गहन रात्रि। दूर से नदी की कल-कल ध्वनि तैरती आ रही है। निर्जन प्रान्त में अकेला खड़ा हूँ। स्वप्न-विह्नल नेत्रों से देख रहा हूँ- ज्योत्स्ना में सारा संसार डूबा जा रहा है। कुत्सित वस्तुएं भी सुन्दर हो उठी हैं। वह कचरे का डिब्बा भी मानो जरीदार कपड़े पहनकर मोहिनी सज गयी हो। आकाश के काले बादलों में भी रूपहला आवेश है। 
निर्जन प्रान्त में अकेला खड़ा हूँ। उसी की प्रतीक्षा में। उसी की प्रतीक्षा में इस गहन रात्रि की समस्त ज्योत्स्ना भी मानो परिपूर्ण हो उठी है। 
आ रही है। -हाँ, वही तो! सर्वांग में उसके है ज्योत्स्ना की आकुलता। उसके नुपूर के गुंजन से ज्योत्स्ना भी सिहर उठी है। ....वही तो, मेरी ओर देखकर मुस्कुरायी।
सहसा एक दुर्धर्ष दस्यु कहीं से भागा आया और उसने उस किशोरी के सीने में चाकू घोंप दिया। ज्योत्स्ना में रक्तरंजित चाकू चमक उठा! रक्त की धारा में ज्योत्स्ना डूब गयी।
ऊर्ध्वश्वांस से भागकर मैंने उस व्यक्ति को पकड़ा। पकड़कर देखा- यह क्या, यह तो मेरा ही विवेक है! 
--ः0ः--

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