31. पास-पास



बैठकर, सोकर, अखबार पढ़कर, ताश खेलकर, अड्डा मारकर, परचर्चा व परनिन्दा कर-कर के विरक्त हो गया। शान्ति नहीं मिल रही है। असली कारण है- अर्थाभाव! मुझे जो करना था, वह कर चुका हूँ। परीक्षा पास कर चुका हूँ, बहुत स्थानों पर नौकरी के लिए दरख्वास्त कर चुका हूँ- यहाँ तक कि इन्श्योरेन्स की दलाली भी कर चुका हूँ; लेकिन कुछ हुआ नहीं। वैसे, अभी और भी बहुत कुछ करना बाकी है। स्टेशनरी या किराना दूकान, या कम-से-कम पान-बीड़ी की एक दूकान खोलकर एकबार चेष्टा करने की सोच रहा हूँ, लेकिन ओह, मक्खियों ने तंग कर रखा है। जहाँ आँख लगी कि ठीक आँख के कोने पर आकर बैठेगी! इतनी मक्खियाँ और इतनी गर्मी! ढंग से बैठकर जो थोड़ी चिन्ता करूँगा, उसका भी उपाय नहीं है। उठ बैठा। इस भरी दुपहरिया में बैठकर चिन्ता करना भी तो मुश्किल है! सोते ही मक्खी! हाथ में पैसे होते, तो मक्खी मारने की दवा छिड़क कर कुछ देर स्थिर होकर चिन्ता करता। आपलोगों को शायद हँसी आ रही है और सोच रहे होंगे, कमाल का चिन्ताशील आदमी है यह!
पेट की चिन्ता के समान सहज मगर जटिल चिन्ता और कोई नहीं है। दिन-रात यही चिन्ता कर रहा हूँ। मैं चिन्ताशील नहीं, चिन्ताग्रस्त हूँ।
...तय कर लिया। कोलकाता जाऊँगा। कोलकाता जाकर जी-जान से कोशिश करक देखूँगा। इस तरह गाँव-देहात में पड़े रहने से कुछ नहीं होगा। दूकान ही अगर खोलनी पड़े, तो कोलकाता ही बेस्ट फील्ड है। नौकरी का भी जुगाड़ हो सकता है।कुछ कहा नहीं जा सकता। अब तक सिर्फ घर बैठे ही दरख्वास्त भेजा हूँ। दफ्तरों का चक्कर लगाने से काम मिलना कोई असम्भव नहीं है।
कोलकाता जाना ही ठीक है।
अगले दिन सुबह पिताजी का चाँदी का हुक्का लेकर निकल पड़ा। गिरवी रखकर कुछ अर्थ का जुगाड़ करना पड़ेगा। अर्थ न लेकर कोलकाता जाने का कोई अर्थ ही नहीं है। चाँदी के हुक्केकी बात सुनकर आपलोग यह मत सोचियेगा कि मैं कोई जमीन्दार-तनय हूँ। वैसी बात नहीं है। मेरे पिताजी शौकीन व्यक्ति थे और इसी कारण सम्भवतः कुछ जोड़कर नहीं रख पाये थे। हुक्का गिरवी रखकर कुल दस रूपये मिले। अपने पास भी दसेक रूपये थे। अतः मैं निकल पड़ा।
--दो--
एक दूर के रिश्तेदार के घर आकर आश्रय लिया। रिश्ता इतना जटिल था कि विकास बाबू मेरे ठीक क्या लगते हैं, यह निर्णय करना मेरे लिए दुःसाध्य हो गया। मेरी माँ की बहन की बेटी की चचेरी सास के भतीजे के फुफेरे साले के अपने साढ़ू भाई थे ये विकास बाबू। कायदे से हिसाब न लगाने पर सम्बन्ध तय करना मुश्किल था। इतने हंगामे में न जाकर प्रथम मुलाकात में ही मैं उनसे बोल पड़ा, "क्या भाया, पहचान रहे हो?" भाया ने निश्चय ही मुझे नहीं पहचाना। फिर भी बोले, "बहुत दिनों बाद मिल रहे हैं न! इसलिए थोड़ा- मतलब... बाँसबेड़े से आ रहे हैं शायद?"
यानि बाँसवाटिका में भी इनके वंश का कोई है। बोला, "नाः, देख रहा हूँ नहीं पहचान पाये। पहचानने वाली बात भी नहीं है। मैं आ रहा हूँ बाँकुड़ा से। -मतलब बाँकुड़ा के भी इण्टीरियर में रहते हैं हमलोग। मैं हुआ आपलोगों का- " कहकर माँ का सुनाया कण्ठस्थ किया हुआ रिश्ते का फार्मूला मैं दुहरा गया और अन्त में बोला, "आप हुए हमारे हेमन्त के साढ़ू भाई। अपने लोग कोलकाता की अली-गली में हैं- भेंट-मुलाकात नहीं हो पाती। इसबार सोचा, चलूँ, जरा विकास भाया से मिल आऊँ।"
कुली के सिर पर मेरे विवर्ण ट्रंक एवं मलिन बिस्तरबन्द की तरफ दृष्टिपात कर विकास बाबू बोले, "यहाँ रहना होगा क्या?"
"ज्यादा नहीं, दो-चार दिन।"
"अच्छा।"
कुली सामान उतारकर पैसे लेकर चला गया।
थोड़ी देर बाद देखा, विकास भाई भी खाना-पीना करके, कपड़े पहन कर बाहर निकल पड़े। अकेले चुपचाप बैठा रहा। यह स्थिति ज्यादा देर नहीं टिकी। अलग-अलग उम्र के एक झुण्ड लड़के-लड़कियों ने आकर मुझे घेर लिया। किसी ने कहा, लॉजेन्स! किसी ने कहा, पतंग चाहिए! किसी ने कुछ न कहकर सीधे जेब में हाथ डाल दिया। मेरे कान के नीचे एक मस्सा था, उसे लेकर ही बहुत खुश हो उठे। इतने कम समय में सिर्फ बच्चे ही हिल-मिल सकते हैं।
...बाहर निकलना पड़ा।
--तीन--
तीन दिन बीते। कोलकाता प्रायः दस साल पहले आया था- पढ़ाई के लिए। अभी घूम-फिर कर देखा, मेरा परिचित एक भी नहीं है। सहपाठीगण पता नहीं कौन कहाँ चले गये हैं। अध्यापक भी सब नये थे। जिस मेस में मैं रहता था, वहाँ अब ड्राय-क्लिनिंग की दूकान खुल गयी है। मुझे किसी ने पहचाना नहीं, मैं भी किसी को पहचान नहीं पाया। घूम-फिर कर पुनः विकास भाई के डेरे पर ही लौट आया।
उपरोक्त तीन दिन इसी प्रकार बीते। विकास बाबू के साथ थोड़ी देर के लिए मुलाकात हो जाती थी सवेरे। सारी सुबह वे हड़बड़ी मचाये रहते, मानो लेटन हो जायें। गमछा लेकर सुबह बाहर निकल पड़ते, लौटकर सौदा-सुलफ रखते ही तेल मालिश करने बैठ जाते। जल्दी-जल्दी शरीर और माथे पर तेल चुपड़कर नल के नीचे नहाते-नहाते ही गृहिणी को हुक्म देते, "भात निकाल दो। अरी सुनती हो- लेट हो जायेगा- पौने नौ बज गये- जाने में भी तो थोड़ा समय लगता है- ।" इसके बाद एक साँस में खाना निगलकर जल्दी से बाहर निकल पड़ते। वापस लौटते-लौटते कभी रात के दस, कभी ग्यारह बज जाते। अतः विकास बाबू के साथ ढंग से बैठकर वार्तालाप करने का अवसर ही नहीं मिल पाता। सोचता, कामकाजी व्यक्ति हैं। विकास बाबू को देखकर ईर्ष्या होती। कितना सुन्दर रोज दफ्तर जाते हैं, सारा दिन काम में व्यस्त रहते हैं, रात में चैन की नीन्द सोते हैं। विकास बाबू के शरणापन्न होने से कैसा रहेगा? कोशिश करेंगे, तो निश्चय ही मेरे लिए एक नौकरी का इन्तजाम कर देंगे।
--चार--
अगले दिन साथ पकड़ा।
जैसे खाना खाकर जल्दी से बाहर निकलने जा रहे थे, मैं बोल पड़ा, "भैया, मैं भी जरा आपके साथ निकलूँगा।"
"मेरे साथ? किसलिए?"
"एक बात करनी थी। मतलब- "
"ठीक है, आईये फिर। देर मत कीजियेगा, मेरा लेट हो रहा है। देर हो जाने पर वह बेटा आ धमकेगा- "
तुरन्त ही निकल पड़ा।
रास्ता चलते-चलते विकास बाबू ने एक बार पूछा, "कोई जरूरी बात है?"
"जी- " कैसे कहूँ, यही सोचने लगा।
"रूपये-पैसे मैं उधार नहीं दे सकता, यह पहले ही बताये देता हूँ।"
"ना-ना रूपये-पैसे नहीं चाहिए। अच्छा चलिये, ट्राम में ही बताऊँगा।"
"ट्राम से तो मैं नहीं जाता। मैं तो पैदल ही जाता हूँ।"
"यह तो अच्छी बात है। चलिये, मैं भी पैदल चलूँगा। कहाँ तक?"
"इडेन गार्डेन।"
"इडेन गार्डेन में दफ्तर? किसका दफ्तर?"
"दफ्तर किसने बताया आपको?" कहकर विकास बाबू सहास्य दृष्टि से मेरी तरफ देखने लगे।
"फिर?"
"अरे राम, आपने शायद यह सोच रखा है कि मैं रोज दफ्तर जाता हूँ?"
"फिर कहाँ जाते हैं?"
थोड़़ा हिचक कर विकास बाबू बोले, "भाग आता हूँ।"
मैं निर्वाक उनके चेहरे की ओर देखता रहा। विकास बाबू कहते रहे, "पिताजी कुछ रुपये Fixed Deposit कर गये थे- उसी के चालीस रुपये मासिक ब्याज से जीवन-निर्वाह हो रहा है। तीन साल लगातार चेष्टा करके भी नौकरी नहीं जुटा सका। जबकि एम.ए. में फर्स्ट क्लास मिला था! चलिये, लेट हो रहा है- वह बेटा आ गया, तो बेंच फिर नहीं मिलेगी।"
दोनों ने चुप रहकर कुछ और रास्ता तय किया। फिर विकास बाबू बोले, "घर में भेद मत खोल दीजियेगा। पत्नी समझती है कि मैं किसी बड़े दफ्तर में बिना वेतन के अप्रेण्टिसी कर रहा हूँ। कुछ दिनों में वेतन मिलने लगेगा। इसलिए जल्दी-जल्दी रोज भात पका देती है।"
फिर कुछ पल हमदोनों चुपचाप पास-पास चलते रहे। फिर विकास बाबू बोले, "भाग आता हूँ। नहीं समझे? घर में एक झुण्ड उन बच्चों के साथ सारा दिन बिताना असह्य है। सभी कुछ न कुछ माँगते रहते हैं। बाँसुरी खरीद दो, लॉजेन्स दो, गुड़िया ला दो! पड़ोसी लड़के की लाल कमीज बनी है, वैसी ही कमीज बनवा दो! घरवाली की भी नाना प्रकार की फरमाईश लगी रहती है। -बस निकल पड़ता हूँ। नहीं समझे?"
फिर कुछ क्षणों की चुप्पी।
अब विकास बाबू जरा हँसकर बोले, "घर में रहने से ही लफड़ा है। नहीं समझे! उस रोज रात में जाकर सुना, छोटा बच्चा गिर गया था- सिर पर खरोंच आ गयी थी। नाक से काफी सारा खून भी बहा। घर में रहने से भाग-दौड़ करके एक डॉक्टर-वॉक्टर बुलाना पड़ता- उधार लेकर। नहीं था- निश्चिन्त। जरा झटक कर चलिये। इडेन गार्डेन में पेड़ की छाया में एक बेंच है, उसी पर लेटकर, बैठकर सारा दिन- समझे- लेट हो जाने पर एक और बेटा आकर उसपर कब्जा कर लेता है- समझे।"
पास-पास दोनों द्रुतवेग से चल रहे हैं।
कहीं इडेन गार्डेन की वह खाली बेंच हाथ से निकल न जाय!
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विदा लेने से पूर्व विनम्र नमस्कार कर वे सज्जन बोले , ” उस मोड़ पर डिस्पेन्सरी खोला हूँ मास्साब , कभी पधारियेगा- “ ” अच्छा। “ .....