और कुछ अपनी




हिन्दी में ‘‘बनफूल’’ की कहानियों का अनुवाद बहुत कम हुआ है। कारण नहीं पता। सम्भवतः उनका शब्द-चयन तथा वाक्य-विन्यास अनुवाद को कठिन बनाते हैं। मैंने अनुवाद करते समय कहानियों को हिन्दी कहानीबनाने के साथ-साथ उनके शब्द-चयन तथा वाक्य-विन्यास को कायम रखने की कोशिश की है। अब यह हिन्दी पाठकों को पसन्द आये, तो बात बने।
इस अनुवाद के प्रकाशित होने पर मुझे ऐसा लगता है, मैं अपने पिताजी की एक (अनकही) इच्छा को पूरी कर रहा हूँ। वे ‘‘बनफूल’’ के भक्त रहे हैं और प्रथम शतकवाली मूल पुस्तक उन्होंने ही मुझे दी थी।
कहानियों के लिए चित्रांकन मेरे मित्र जयचाँद दास ने किया है।
ब्लॉग में ‘‘बनफूल’’ का जो व्यक्तिचित्र (पोर्ट्रेट) है, उसे मैंने एक बॅंगला अखबार के रविवारीय परिशिष्ट (दिनांकः 11 जुलाई 1999) से स्कैन किया है। यह एक तैलचित्र की तस्वीर है, जिसके चित्रकार रिण्टु रायहैं।
यहाँ मनिहारी स्थित उस घर के दो छायाचित्र भी हैं (अलग-अलग कोणों से), जहॉं ‘‘बनफूल’’ का जन्म हुआ था। मनिहारी में ही रह रहे ‘‘बनफूल’’ के एक भतीजे (बनफूल के पाँचवे भाई के सुपुत्र) श्री उज्जवल मुखोपाध्याय ने इस घर को एक स्मारक की तरह सहेज कर रखा है। 
चूँकि हिन्दी के पाठकों के बीच ‘‘बनफूल’’ आज भी एक अनजाना-सा नाम है, और उनकी अपने ढंग की अनूठी कहानियाँ हिन्दी साहित्य में लोकप्रिय नहीं हैं, इसलिए उनकी कहानियों के अनुवाद की शृँखला को मैं ‘‘जंगल के फूल’’ नाम से प्रस्तुत कर रहा हूँ। फिलहाल तो "ई-बुक" के रुप में ही यह शृँखला प्रस्तुत है, भविष्य में किसी प्रकाशक ने अगर रुचि दिखायी, तो मुद्रित पुस्तक के रुप में भी ये कहानियाँ उपलब्ध हो जायेंगी।
आशा है, कहानी रूपी इन फूलों के रस की मिठास हिन्दी के साहित्यरसिक रूपी भ्रमरों को तृप्त करेगी और इससे मुझे अगली कुछ और कहानियों के अनुवाद प्रस्तुत करने के लिए भी प्रेरणा मिलेगी...  
इति।                       

                                                                                                                              -जयदीप शेखर

                                                                                                  jaydeepshekhar@gmail.com
Mob- 9798720838


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