कहानी-संग्रह: eBooks

"बनफूल" की इन अनूदित कहानियों को "जंगल के फूल" शृँखला के अन्तर्गत "ई-बुक" के रुप में प्रस्तुत किया जा रहा है.
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"जंगल के फूल-1" 


प्रथम खण्ड की कहानियाँ:
1.  अमला, 2.  पारूल प्रसंग, 3.  अपना-पराया, 4.  अनजाने में, 5.  कली भौंरा और जुगनू, 6.  अद्वितीया, 7.  रामायण का एक अध्याय, 8.  विधाता, 9.  राम नाम सत्य है, 10. सनातनपुर के वासी, 11. अलकनन्दा, 12. युगान्तर, 13. नकारे की आत्मकथा, 14. वैष्णव-शाक्त, 15. स्त्री स्वभाव, 16. जगमोहन, 17. मालिक-नौकर, 18. पत्थर का टुकड़ा, 19. जाग्रत देवता, और 20. दर्जी
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द्वितीय खण्ड की कहानियाँ
21. बेचाराम बाबू 22. अनिर्वचनीय 23. तर्क व स्वप्न 24. चलचित्र 25. युगल स्वप्न 26. अन्दर व बाहर 27. सुलेखा का क्रन्दन 28. परीकथा 29. ऐरावत 30. खड़ाऊँ का मारा 31. पास-पास 32. विद्यासागर 33. पाठक की मृत्यु 34. दत्त महाशय 35. मिस्टर मुखर्जी 36. कैनवसर 37. थ्योरी ऑव रिलेटिविटी 38. कालू 39. भोम्बल भैया 40. मक्खीचूस 
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"जंगल के फूल- 3"  


तृतीय संग्रह में शामिल कहानियाँ:
41. आँखें (चोख गेलो), 42. एक बूँद कहानी (एक फोंटा गल्प), 43. बुधनी, 44. अन्तर्यामी की करतूत (अन्तर्यामीर काण्ड), 45. श्रीपति सामन्त, 46. शरशैया, 47. भ्रष्ट लग्न, 48. जॉर्जेट की साड़ी (घटनाचक्र), 49. भूत, 50. मनुष्य (मानुष), 51. चार चित्र (चित्रचतुष्टय), 52. बाघा, 53. सरला (परिवर्तन), 54. यूथिका, 55. खट्टी दही (बुर्जुआ-प्रोलिटारियेट), 56. चोर (त्रिवेणी), 57. मुखर्जी और चटर्जी (माधव मुकुज्जे), 58. कानून (आईन), 59. खुला मुँह (नाथुनीर मा), 60. संक्षेप में उपन्यास (संक्षेपे उपन्यास)
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32. विद्यासागर

विदा लेने से पूर्व विनम्र नमस्कार कर वे सज्जन बोले , ” उस मोड़ पर डिस्पेन्सरी खोला हूँ मास्साब , कभी पधारियेगा- “ ” अच्छा। “ .....