40. मक्खीचूस

(मूल बँगला कहानी: श्रीधरेर उत्तराधिकारी)

 

मक्खीचूस!

स्थानीय बिहारियों ने श्रीधर मित्र को यही उपनाम दे रखा था। इस अद्भुत शब्द का अर्थ शायद बहुतों को पता न हो। मक्खीचूस की पदवी उन महानुभावों को दी जाती है, जो मक्खी को चूसकर भी गुड़ या शहद का स्वाद लेने में पीछे नहीं हटते। श्रीधर मित्र की कृपणता एवं शोषणपटुता के सम्बन्ध में स्थानीय बँगाली, बिहारी, अबाल-वृद्ध-वनिता सभी एकमत थे। सुबह-सुबह कोई उनके नाम का उच्चारण नहीं करता; अगर गलती से किसी के मुँह से उनका नाम निकल जाता, तो वह उपवास की आशंका से विषण्ण हो उठता।

श्रीधर मित्र के दीर्घ जीवन की यही विशेषता थी कि उन्होंने कभी किसी को एक कौड़ी भी दान नहीं दिया, लेकिन बहुत-सी कौड़ियों को बहुत-से लोगों से बहुतेरे तरीके से आत्मसात् किया है। अब भी कर रहे थे।

वर्तमान में सूद पर पैसा लगाना ही उनकी प्रधान आजीविका थी। किराये के कई मकानों से भी प्रतिमाह उनकी कमाई होती थी। इनके अलावे, थोड़ी जमीन बँटाई पर थी। कम्पनियों के कुछ शेयर भी थे। आय के रास्ते इतने सारे थे, मगर व्यय का कोई रास्ता नहीं था- कहने से चलेगा। आदमी होने पर ही खर्च होगा न। श्रीधर के तीनों कुल में कोई नहीं था। आत्मीय-स्वजन सभी एक-एक कर परलोक सिधार कर उन्हें निश्चिन्त कर चुके थे। रहने वालों में थे- श्रीधर स्वयं और उनका पुराना नौकर नकुड़। नकुड़ हालाँकि नौकर मात्र नहीं था। वह एक ही साथ रसोईया, नौकर, दोस्त, परामर्शदाता- सबकुछ था।

दिन में नकुड़ भात पका लेता था। रात में हरि ग्वाला सूद चुकाने के उद्देश्य से जो दूध दे जाता था, वही दोनों के लिए यथेष्ट होता था! नाश्ते का कोई झंझट ही नहीं था। पोशाक-परिच्छद का भी कोई खर्च नहीं ही था- कहा जा सकता है। कानूनन जितना आवरण जरूरी था, उसी को श्रीधर मित्र अपव्यय मानते थे। दिन में सूर्य और रात में रेंड़ी (अरण्डी) के तेल का एक छोटा-सा दीया उनका अन्धकार दूर करता था।

फलस्वरुप रुपया जम रहा था। बैंक में नहीं- जमीन के नीचे- ऐसी ही जनश्रुति थी। श्रीधर मित्र हालाँकि भूल से भी अपने ऐश्वर्य की बात किसी से नहीं कहते थे, किन्तु सभी जानते थे श्रीधर मित्र नामक खड़ूस बूढ़ा बहुत ही पैसे वाला आदमी है। उनकी इस पूँजी से थोड़ा-सा अंश हासिल करने के लिए बहुत लोग बहुत रूप धारण कर उनके द्वार पर धरना देते थे। श्रीधर शहर के बाहर अपने ही एक जर्जर खण्डहरनुमा मकान में रहते थे, जिसके लिए कोई किरायेदार नहीं मिलता था। किन्तु शहरप्रान्त के उस जर्जर मकान में ही पैसे के जरुरतमन्द जाकर उपस्थित होते थे।

 

-दो-

उस दिन गये थे जलधरबाबू।

जलधरबाबू सिर्फ वकील ही नहीं, बल्कि स्वदेश-हितैषी भी थे। फिलहाल शहर में एक बालिका विद्यालय की स्थापना के लिए वे धन-संग्रह कर रहे थे। श्रीधर मित्र का हृदय विगलित करने के लिए स्त्री-शिक्षा की उपयोगिता पर एक सारगर्भित वक्तृता वे दिये जा रहे थे कि अचानक उन्हें रोककर श्रीधर मित्र बोले, “नहर बनाकर घड़ियाल बुला लाने की जरुरत क्या है?

विस्मित जलधर बोले, “क्या मतलब?

“मतलब यह कि पढ़ाई-लिखाई बिना सीखे ही इस शहर की लड़कियाँ जिस प्रकार बाबू हो गयी हैं, पढ़ाई-लिखने सीखने पर तो इस देश सारे गणेश ही उल्टे हो जायेंगे। क्यों नेकड़े?

नकुड़ मृदु हँसी हँसकर रह गया।

श्रीधर फिर बोले, “लड़कों ने पढ़ाई-लिखाई सीखकर गणेश को गिरा दिया है- लड़कियों के सीखने पर वे एकदम उल्टे हो जायेंगे। कोई नहीं बचा सकेगा। यह सब दुर्बुद्धि आप छोड़िए जलधरबाबू।

जलधरबाबू ने गणेश की ओर से स्त्री-शिक्षा पर विचार नहीं किया था। शुरू में तो उन्हें भी कोई जवाब नहीं सूझा। लेकिन वे ठहरे वकील आदमी। कहाँ किस बात को किस तरह से कहने से काम निकल सकता है- यह उनका जाना हुआ था।

अतः वे बोले, “लड़कियाँ पढ़ाई-लिखाई सीखकर खुद रोजगार करेंगी, तब न जानेंगी कि कितने धान में कितना चावल होता है। सिर का पसीना पैरों पर लाकर उपार्जन नहीं करने से पैसे के मोल को नहीं समझा सकता। गणेश को खड़ा रखने के लिए ही लड़कियों को पढ़ाई-लिखाई सिखाना उचित है।

पता चला, अ-वकील श्रीधर मित्र भी कम नहीं थे।

नकुड़ की तरफ एक बार सहास्य दृष्टि डालकर वे बोले, बकरी से जौ की मड़ाई अगर सम्भव हो भी जाय, तो आप कहना चाहते हैं कि इससे बकरी का स्वभाव बदल जायेगा? वह जौ को खायेगी नहीं? या, जौ की ढेरी में छोड़ देने पर उसे तहस-नहस नहीं करेगी? बताओ न रे नकुड़े, उस पार वाली की बात।

कुछ ही दूरी पर बैठे नकुड़ ने इस बार भी कुछ न कहकर एक मृदु हास्य किया।

श्रीधर ने तब खुद ही वर्णन किया, “घोषालपाड़ा में मेरा जो मकान है, उसमें एक नया किरायेदार आया है। पति-पत्नी हैं। सुनने में आया है कि दोनों ही अच्छे पढ़े-लिखे हैं, लेकिन उनके घर जाकर देखकर आईए कि क्या हालत है! स्वामी लगातार सिगरेट फूँके जा रहे हैं और स्त्री सिलाई किये जा रही है। मशीन की खिच-खिच सुनकर लगता है, मानो दर्जी का घर हो। क्या एक कुरता पहनती हैं महिलाएं, सुना कि उसी की सिलाई चलती रहती है। उस कुरते को क्या जो कहते हैं- नाम भी याद नहीं रहता उस फालतू चीज का।

नकूड़ ने बताया, “बलाउस।

“बलाउस-बलाउस! इतने बलाउसों का क्या जो होगा, यही सोचता हूँ। आखिर पहने कब जायेंगे?

जलधरबाबू समझ गये, तर्क शक्ति से काम नहीं चलेगा।

बोले, “सभी क्या एक जैसे होते हैं? और आप-जैसे जानकार, बुद्धिमान व्यक्ति के साथ क्या मैं तर्क कर सकता हूँ? कुल-मिलाकर, बात इतनी-सी है कि एक सत्कर्म आरम्भ किया है मैंने, आपको इसमें सहयोग करना पड़ेगा।

विस्मय विस्फारित भाव लिये श्रीधर कुछ पल जलधरबाबू के चेहरे की तरफ देखते रहे। विस्मय का भाव कटने के बाद वे बोले, “सहयोग?

“जी हाँ। यह पाँच लोगों का कार्य है, आपको कुछ देना होगा।

कातर स्वर में श्रीधर बोले, “मैं दरिद्र आदमी हूँ। इतने वृहत् कार्य में सहयोग करना मेरे बस की बात नहीं है जलधरबाबू। विश्वास कीजिए, मैं बहुत ही दरिद्र हूँ।

जलधरबाबू ने विश्वास नहीं किया। बोले, “बूँद-बूँद से ही घट भरता है। सभी थोड़ा-थोड़ा मदद नहीं करेंगे तो कैसे होगा? समझ नहीं रहे हैं?

“समझ तो रहा हूँ। लेकिन मेरी सामर्थ्य तो बूँद की भी नहीं है।

“वह मैं नहीं सुनूँगा- कुछ तो देना ही होगा आपको।

जलधरबाबू में हाथ धोकर पीछे पड़ने का भाव लक्ष्य कर श्रीधर शंकित हुए। वकील आदमी को नाराज करने का साहस भी नहीं था उनमें। सहसा श्रीरामचन्द्र के प्रति रावण के मृत्युकालीन उपदेश की उन्हें याद हो आयी। अशुभस्य कालहरणम्! बोले, “अभी तो किसी हाल में नहीं दे पाऊँगा। अगले महीने चेष्टा करके देखनी होगी। आधा पेट खाकर रहना होगा, और क्या! क्या कहते हो रे नकुड़े?

नकुड़ ने पुनराय मृदुहास्य किया।

और कोई रास्ता न देख जलधरबाबू उठ खड़े हुए।

 

-तीन-

जलधरबाबू की बात को थोड़ा विस्तार से बताया। सबकी बातों को विस्तार से बताने का प्रयोजन नहीं है। संक्षेप में इतना कहना ही यथेष्ट होगा कि कोई भी श्रीधर के धनभण्डार को एक रत्ती भी हल्का नहीं कर पाया- सबको व्यर्थ मनोरथ होना पड़ा था। गेरूआधारी सन्यासियों का दल, खद्दरधारी स्वदेशीय दल, हारमोनियमधारी बाढ़ सहायताकारियों का दल, स्वास्थोन्नति विधायिनी सभा के सदस्यगण, लाइब्रेरी प्रतिष्ठातृगण, कन्यादायग्रस्त निर्धन ब्राह्मण- सभी के आवेदनों को श्रीधर मित्र धैर्य के साथ सुनते जाते थे। धैर्य खोकर विचलित हो उठे हों- ऐसी घटना कभी नहीं घटी। सभी को किन्तु अवशेष में रिक्तहस्त ही लौटना पड़ता था।

 

-चार-

अतः रुपया जमते जा रहा था।

प्रतिपल, प्रतिक्षण, प्रतिदिन, प्रतिमाह, प्रतिवर्ष, धीरे-धीरे संचित होते हुए श्रीधर मित्र की धनराशि एक ऐसे परिमाण में पहुँच गयी कि अन्त में वह श्रीधर मित्र की ही चिन्ता का कारण बन गयी।

श्रीधर चिन्ता करने लगे- जीवन तो शेष होने वाला है। मृत्यु किसी भी क्षण आ सकती है। इतने रुपयों की परिणति आखिर क्या होगी? मिट्टी के नीचे दबा यह विपुल ऐश्वर्य विलुप्त हो जायेगा? अभी उस दिन लॉटरी में भी उन्होंने कुछ रुपये जीते थे। लॉटरी खेलने के प्रति श्रीधर का झुकाव था। बीच-बीच में लॉटरी के लिए ही वे दो-चार रुपये फिजूल में खर्च करते थे। गतवर्ष भी लॉटरी के चलते कुछ धनलाभ हुआ था, लेकिन इतने धन की परिणति क्या होगी- क्या नकुड़ ही शेषकाल में सब भोग करेगा? आयौवन-सहचर नकुड़ को अवश्य ही वे कुछ देकर जायेंगे, लेकिन सारे रुपये का भोग वह कर रहा है- यह तस्वीर उन्हें कुछ जँच नहीं रही थी। नकुड़ ही भला और कितने दिन जीयेगा? अन्त में सारा रुपया नकुड़ के उत्तराधिकारी हिप्पीकट बालों वाले उसके भतीजे के हाथों में चला जायेगा क्या? इस बात की कल्पना से ही श्रीधर के चित्त में कड़वाहट घुल जाती।

बालिका विद्यालय में रुपये दे दिये जायें? नाः, जीते-जी वे ऐसा नहीं कर सकते। आजकल की फैशनपरस्त, हाई हील जूती पहनने वाली लड़कियों को देखते ही उनके तन-बदन में आग लग जाती थी। दातव्य चिकित्सालय में रुपया दे देने से कैसा रहेगा? दातव्य चिकित्सालय के वर्तमान डॉक्टर छँटी हुई मूँछों वाले परेश चक्रवर्ती का चेहरा स्मृतिपटल पर उभरते ही यह इच्छा फिर दुबारा उत्पन्न नहीं होती। गेरूआधारी सन्यासियों को? इन ढोंगी बाबाओं को रुपया देकर लाभ? बाढ़पीड़ितों को? स्वयं भगवान ने जिन्हें दण्डित किया है, उन्हें बचायेंगे श्रीधर मित्तिर? इस बारे में सोचना भी अनुचित है, रुपये पानी में जायेंगे। स्वास्थोन्नति समिति के छोकरे कुछ रुपयों के लिए उनके पास आये थे। उनको कुछ देने से कैसा रहेगा? घोड़े का अण्डा होगा! जो स्वास्थ्य अभी उन लोगों का है, उसी के लिए खुराक जुटाना मुश्किल हो रहा है। ऐसे भी सारे मुस्टण्डे किस्म के हैं। इससे अधिक स्वास्थ्यवान होने पर खुराक कौन जुटायेगा? सभी के गणेश उलट जायेंगे अन्त में!

श्रीधर को कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

रोज ही चिन्ता करते। किन्तु क्या करने से जो धन की वास्तव में सद्गति होगी- यह वे किसी भी तरह से तय नहीं कर पा रहे थे।

 

-पाँच-

अन्त में, एक गहन रात्रि में उनकी मृत्यु हुई। क्या भयानक रात थी वह! प्रतिपल कड़कती बिजली, मूसलाधार वर्षा, तेज आँधी। प्रकृति ने रौद्र रुप धारण कर रखा था। बेचारा नकुड़ इस आँधी-तूफान को झेलते हुए बाहर निकला। दाह-संस्कार के लिए लोगों को बुलाना होगा। जलधरबाबू के पास गया। श्रीधर से जलधरबाबू प्रसन्न नहीं थे। अतः उन्होंने कहा कि उनकी तबियत ठीक नहीं है- ऐसे खराब मौसम में रात के वक्त वे शव नहीं ले जा सकते। नकुड़ ने तब अन्यान्य भद्रलोगों के पास जाकर इस संवाद का ज्ञापन किया और कातरता के साथ सहायता के लिए प्रार्थना की। लेकिन मक्खीचूस के शव को इस भयानक रात में तीन कोस दूरवर्ती श्मशान तक वहन करने के लिए कोई भी राजी नहीं हुआ। एक न एक बहाना बनाकर सबने दरवाजे की कुण्डी चढ़ा ली। बेचारा नकुल व्याकुल होकर एक द्वार से दूसरे द्वार तक घूमने लगा।

 

-छह-

काफी देर बाद नकुड़ लौटा।

सिर्फ एक ही आदमी का जुगाड़ वह कर पाया था। वह आदमी और कोई नहीं- घोषालपाड़ा के सिगरेट पीने वाले वही सज्जन थे। श्रीधर की मृत्यु संवाद से एकमात्र वे ही विचलित हुए थे और इस खराब मौसम के बावजूद शवयात्रा में जाने के लिए उन्होंने आपत्ति नहीं की थी। ब्लाऊज-विलासिनी उनकी पत्नी ने भी इस विषय में उन्हें उत्साहित किया; बाहर खड़ा नकुड़ अपने कानों से यह सुनकर मुग्ध हो गया था।

घर का ताला खोलकर अन्दर घुसते ही मृत श्रीधर मित्र उठकर बैठ गये और आग्रह के साथ पूछ बैठे, “कौन-कौन आया?

सिगरेटखोर सज्जन स्तम्भित!

नकुड़ ने विस्तार के साथ सारी बातों का वर्णन किया। लॉटरी-प्रेमी श्रीधर ने सब सुना और उसके बाद अकस्मात् उठकर सिगरेटखोर सज्जन को प्रगाढ़ आलिंगनपाश में बाँधकर चुम्बन किया। श्रीधर को इस तरह उच्छ्वसित होते नकुड़ ने कभी नहीं देखा था। चुम्बन के बाद श्रीधर बोले, “तुम्हीं को मैं अपनी चल-अचल समस्त सम्पत्ति का उत्तराधिकारी बनाता हूँ। नकुड़ को भी अवश्य कुछ दूँगा।

कुछ क्षण रूककर वे पुनराय बोले, “देखो, नकद चार लाख रुपये हैं मेरे पास। इससे अगर तुम चाहो, तो स्त्री-शिक्षा के बाबद कुछ खर्च कर सकते हो। अब आपत्ति करना मेरे बस में नहीं रहा।

 

अगले ही दिन यथारीति वसीयत तैयार करवा कर श्रीधर ने अपनी बात को कार्यरूप में परिणत किया। आमरण उन्होंने इस वसीयत में परिवर्तन नहीं किया।

***

39. भोम्बल भैया

(मूल बँगला कहानी: भोम्बल’दा)

 

हृष्ट-पुष्ट, गोल-मटोल चेहरा।

भेंट होते ही चेहरा स्निग्ध हँसी से खिल उठता। हाथ में एक चुटकी नस्सी लेकर उसे नाक के आस-पास लगाकर भोम्बल भैया सुबह से ही सड़क की मोड़ पर खड़े रहते और आने-जाने वाले परिचितों के साथ हँसी-खुशी बातचीत करते।

यह उनका रोज का नियम था। 

“अरे मातुल, मछली कितने में लिये? जबर्दस्त मछली है! छह आना सेर? क्या कहते हो?

“बाजार-भाव तो आठ आना है, मैंने लिया छह आने में।”

भोम्बल भैया ने विस्मय के साथ कहा, “डैम चीप!”

मातुल को इस बात का अहंकार था कि वह सस्ते में चीजें खरीद सकता है। कोई अगर इसका जिक्र करे, तो वह प्रसन्न होता था। मातुल के पास लेकिन रूकने का समय नहीं था- दफ्तर जाना था। वे तेज कदमों से चला गया।

“अरे भूतो, मछली खरीद कर ला रहे हो क्या- कितने में लिये? छह आना सेर? डैम- ”

भोम्बल भैया को बीच में रोकते हुए क्षोभ के साथ भूतो बोल पड़ा, “और मत पूछो भोम्बलदा! हम-जैसे लोगों के लिए लोटा-कम्बल लेकर निकल पड़ना ही उचित होगा अब। छह आना सेर मछली? हमलोग भला खरीद कर खा सकते हैं?

भोम्बल भैया ने आँखों को माथे पर चढ़ा लिया।

“छह आना सेर! क्या कहते हो! यह तो गला काट रहा है!”

भूतो बताने लगा, “आधा सेर लिया हूँ, यह देखो न- बहुत हुआ तो चार-पाँच पीस होगा। तीन आना पैसा अर्थात् एटीन पाईस लेकिन साफ हो गया।”

“बहुत बुरे दिन आ गये हैं, सही में।”

कहकर भोम्बल भैया ने आवाज के साथ नस्सी खींचा और अपने नास्याभिभूत चेहरे को यथासम्भव चिन्ताग्रस्त बनाने में सफल रहे।

“एक चुटकी हमें भी देना भोम्बलदा। मेरी नाक में ही डाल दीजिए- मेरे तो दोनों हाथ बँधे हुए हैं- ”

“लो खींचो ठीक से- ”

भोम्बल भैया ने एक चुटकी नस्सी भूतो के नासारंध्र के सामने पकड़ा।

यथासम्भव उसे खींचकर भूतो चला गया।

कुछ दूरी पर अक्षयबाबू दिख गये।

अक्षय बाबू काँग्रेस-सेवक थे और पक्के खद्दरधारी थे। स्थानीय काँग्रेस कमिटी के प्रमुख थे और इस हैसियत से भाषण आदि देते रहते थे।

उनके पास आते ही हथेली से नस्य झाड़ते हुए भोम्बल भैया सोच्छ्वास बोल उठे, “अक्षयबाबू, कल आपका भाषण वाकई गजब का था- जिसे कहते हैं मर्मस्पर्शी। और यह कुरता तो खूब बनवाया है आपने- खद्दर है क्या? देखूँ जरा, वाह!- ”

कुरते के कपड़े को हाथों में लेकर जाँचते हुए भोम्बल भैया बोले, “वाह! यह तो मखमल-जैसा है। गजब चीज है!”

दोनों आँखें बड़ी-बड़ी करके मोटी आवाज में भविष्यवाणी वाले अन्दाज में अक्षयबाबू बोले, “अब चाहे मखमल हो या टाट हो, खद्दर ही हम लोगों का एकमात्र सम्बल है- इसके अलावे और कोई रास्ता नहीं है- ”

कहकर अचानक आँखों को छोटा कर लिया उन्होंने। यह उनका अपना अन्दाज था।

भोम्बल भैया ने छूटते ही कहा, “यह भी कोई कहने की बात है! देश के लिए आप लोग जिस तरह प्राणों की बाजी लगाते हैं, वह तो देश के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा रहेगा। बिना सैक्रिफाइस के कुछ होता है? खद्दर लेकिन गजब का है। खूब जँच रहा है आप पर- कितना करके गज है?

“शायद डेढ़ रुपया। ठीक से याद नहीं।”

“दाम भी वैसा कुछ ज्यादा नहीं है- वाह!”

“छोड़ो, एक बार निवारण घोषाल के यहाँ जाना पड़ेगा। सुनने में आया है कि वह एण्टी-काँग्रेस प्रोपगण्डा कर रहा है।”

भोम्बल भैया कुरते का कपड़ा देख रहे थे, छोड़ दिया उन्होंने।

दयामय काका नजर आ गये। वे रास्ते के दूसरी तरफ से जा रहे थे। भोम्बल भैया ने हाँक लगायी, “काका, बिना देखे निकले जा रहे हो! हाल-समाचार तो ठीक है?

नाटे कद के सिर से पाँव से ढके हुए दयामय काका सड़क पार करके आये। आकर बोले, “समाचार और क्या होगा? सूर्य-चन्द्र अभी भी उग रहे हैं- अच्छे में तो बस यही है। सारा बाजार छान मारकर भी एक जोड़ा गरम विलायती मोजा नहीं मिला भाई।”

“ये बात है?

“हाँ भाई। पहले एक तरह का सफेद मोजा- थोड़ा पीलापन लिये हुए- जो आता था! एक जोड़ा खरीदते ही निश्चिन्त! पहन कर भी आराम था और चलता भी खूब था। पिछले के भी पिछले साल खरीदा था एक जोड़ा। खींच-तान कर दो साल पहन ही लिया। अब इस साल नहीं चलने वाला है। उस मोड़ पर एक बत्तमीज नौजवान ने कटपीस की दूकान खोली है, उसने तो लम्बा एक लेक्चर ही झाड़ दिया- विलायती चीजें नहीं खरीदनी चाहिए। यह क्या तुम मुझे सिखाओगे? उस तरह का देशी मोजा जरा बनाकर तो दिखाओ- दिखाओ मुझे!”

कहकर दुबले-पतले दयामय काका ने सामने थोड़ा झुककर दाहिने हाथ को चक्राकार घुमा दिया।

भोम्बल भैया मुस्कुराते हुए कुछ देर दयामय काका की तरफ देखते रहे। इसके बाद डिब्बी से एक चुटकी नस्सी निकालते हुए दबे स्वर में चुपके-चुपके बोले, “आजकल सारी बातें जोर-शोर से नहीं बोलनी चाहिए काका। अभी-अभी अक्षयबाबू गुजरे हैं यहाँ से। विलायती चीजों की कोई तुलना है? जिसको कहते हैं- लाजवाब। लेकिन किससे कहा जाय, बताईए। आजकल अक्षयबाबू की ही चलती है। जैसा समय आ गया है कि अच्छी चीजें मिलना भी दूभर हो गया है!”

भोम्बल भैया ने चेहरे का हाव-भाव ऐसा बनाया, मानो मन की गोपनीय बात को दयामय काका से साझा करके उन्हें भारी राहत मिली हो।

काका बोले, “अभी मैंने कहा न कि अच्छे में बस यही है कि सूर्य-चन्द्र अभी भी उग रहे हैं। चलता हूँ, देखूँ, मारवाड़ी लोगों की दूकानों में पता करुँ जरा। होने से इन्हीं लोगों के पास होगा। ठण्ड भी कुछ ज्यादा ही पड़ रही है भाई। नौकरी का कुछ हुआ?

“कहाँ कुछ हुआ!”

काका गये।

आया फणी।

चौदहवर्षीय एक किशोर- स्थानीय स्कूल में पढ़ता है।

उसके साथ भोम्बल भैया ने कुछ देर फुटबॉल खेल पर चर्चा की और उसको भी एक चुटकी नस्सी दी। उसकी स्कूल टीम उस दिन छह गोल से हार गयी थी। इसका एकमात्र कारण रेफरी का पक्षपात था- इस विषय में भी वे उसके साथ एकमत हुए।

फणी के जाने के बाद आये टकले भट्टाचार्य।

भट्टाचार्य महाशय आजकल के लड़के-किशोरों की निन्दा करने में सदा उन्मुख रहते थे। आते ही उन्होंने आजकल के लड़के-लड़कियों की धर्महीनता एवं म्लेच्छाचार का प्रसंग उठाया और भोम्बल भैया का समर्थन प्राप्त किया।

कुछ देर में अति आधुनिक एक युवक विमल आया। धर्म ही राष्ट्र की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है तथा सस्ते में मुर्गी का अण्डा ही बिना मिलावट का श्रेष्ठ खाद्य है- विषयों पर उसने चर्चा की और वह भी भोम्बल भैया की सम्पूर्ण सहानुभूति हासिल कर सीटी बजाता हुआ चला गया।

इस प्रकार, बहुत लोग आये-गये।

नस्सी की चुटकी हाथ में लिये भोम्बल भैया सारी सुबह मोड़ पर खड़े होकर सभी के साथ सभी विषयों पर ही सहमत हुए।

भोम्बल भैया का मन जल के समान है- जब जिस पात्र में उसे रखा जाता है, तब तत्क्षणात् बिना किसी द्विधा के वह उसी पात्र का आकार ग्रहण कर लेता है। इसी के चलते उनकी नौकरी भी चली गयी थी। दफ्तर में बड़ेबाबू के समक्ष छोटेबाबू के सम्बन्ध में, और छोटेबाबू के सामने बड़ेबाबू के सम्बन्ध में ऐसी बातें भोम्बल भैया सरल मन से खोल देते थे कि दोनों ही उनसे बुरी तरह नाराज हो गये- फलस्वरूप नौकरी चली गयी।

भोम्बल भैया सबका मन रखते हुए बातें करते थे, लेकिन आश्चर्य की बात कि कभी किसी का मन नहीं जीत पाये। सबकी बातों का समर्थन करते, लेकिन कोई भी मानो उनको महत्व नहीं देता था। यहाँ तक कि अपनी गृहिणी भी नहीं। घर में सभी प्रकार के आचरण को समर्थन देने के कारण तथा परस्पर विरोधी बातें बोल जाने के कारण भोम्बल भैया प्रायः रोज ही गृहिणी की झिड़की सुनते थे और विमूढ़ होकर चुप बैठ जाते थे। कभी-कभी इन बातों को लेकर इतनी अशान्ति पैदा होती थी कि भोम्बल भैया घर से बाहर निकल कर गंगा के किनारे जाकर अकेले चुपचाप बैठ जाते थे।

उस समय भोम्बल भैया के चेहरे को देखकर सचमुच बहुत कष्ट होता था।

उनके तरल मन को मानो कहीं भी, कभी भी आश्रय नहीं मिल रहा हो।

असहाय विपन्न चेहरा।

दूर गंगा के उस पार क्षितिज की ओर देखते हुए बैठे रहते।

सरल गोल-मटोल चेहरा विमर्ष।

हँसी नहीं।

***

40. मक्खीचूस

(मूल बँगला कहानी: श्रीधरेर उत्तराधिकारी)   मक्खीचूस! स्थानीय बिहारियों ने श्रीधर मित्र को यही उपनाम दे रखा था। इस अद्भुत शब्द का अर्...