37. भांग का लड्डू

(मूल बँगला कहानी: थ्योरी ऑव रिलेटिविटी)

 

जो दुःख बिलकुल सामने होता है, वही सबसे अधिक कष्टदायक होता है- इस बात को मर्म से अनुभव कर रहा था। मेरे सिर पर उधार है, पत्नी खूबसूरत नहीं है, मामूली किरानीगिरी करके जीवनयापन कर रहा हूँ और इसी पर गर्व करता हूँ, कॉलेज के जो सहपाठी पढ़ाई में मुझसे निम्नतर स्थिति में थे, वे केवल पैरवी के बल पर जीवन में मुझसे उच्चतर स्थिति में पहुँच गये हैं- इस प्रकार के छोटे-बड़े बहुत सारे दुःख हैं मेरे, लेकिन फिलहाल सबसे ज्यादा कष्ट का कारण बनी हुई है- यह बूढ़ी। बूढ़ी अपने मैले-कुचैले दुर्गन्धयुक्त कपड़ों के साथ मेरे सामने से हटे, तो राहत मिले। खिड़की से बाहर का दृश्य दिख रहा था- सन्ध्या का आकाश रंग-बिरंगी छटाएं बिखेर रहा था- लेकिन इस बूढ़ी के न हटने से, ...ओह, मुश्किल हो गया था!

मौसी की बीमारी की खबर पाकर कोलकाता जा रहा था। मन्थर गति की पैसेन्जर ट्रेन, ग्रीष्मकाल और मेरा टिकट तीसरी श्रेणी का। अतः जो कष्ट मैं भोग रहा था, वह दुःसह होते हुए भी उचित ही था- कुछ इसी तरह की सान्त्वना मैं मन-ही-मन स्वयं को दे रहा था, ऐसे समय में पीछे से अर्द्धमलिन परिच्छदधारी एक सज्जन की आवाज सुनायी पड़ी, “रास्ते से जरा हटके खड़े होईए। बाथरूम जाने का रास्ता बन्द मत कीजिए। थोड़ा हटिए मेहरबानी करके।”

यथासम्भव शरीर को सिकोड़ कर सज्जन के लिए रास्ता बना दिया। बाथरूम से लौटने के क्रम में सज्जन ने कहा, “यहाँ खड़े होकर क्यों कष्ट झेल रहे हैं? चलिए उस तरफ।”

पूछा, “उधर जगह है क्या?

“ओह, चलिए तो सही- ”

बूढ़ी के सान्निध्य से परित्राण पाने के लिए उन्मुख था ही। अतः सज्जन का अनुसरण करते हुए डिब्बे के दूसरे कोने में जा उपस्थित हुआ। सज्जन ने बड़ी हार्दिकता के साथ प्रस्ताव दिया, “बैठिए, मेरे इस बक्से के ऊपर ही बैठ जाईए। असली स्टील है, आपके-जैसे दस लोगों के बैठने से भी इसका कुछ नहीं बिगड़ेगा।”

ट्रंक देखने में अच्छा ही था। उसके दृढ़त्व के सम्बन्ध में सन्देहास्पद कुछ नहीं था। वस्तुतः मैंने सन्देह प्रकाश किया भी नहीं था। तथापि सज्जन बोलने लगे, “छगनलाल मुझे बढ़िया चीज न दे- ऐसा हो सकता है? उसका जो मुनीम है, वह मेरी मुट्ठी में है।”

मैं ट्रंक के ऊपर बैठ गया।

थोड़ा हँसकर सिर्फ कहा, “ये बात है!”

“ये बात है मतलब? छगनलाल की मजाल है, जो मुझे खराब चीज दे दे? उसका मुनीम बैजूप्रसाद मेरा कर्जदार है।”

सज्जन को प्रसन्न करने के लिए मैंने फिर कहा, “सचमुच आपका ट्रंक सुन्दर और मजबूत है। देखने में भी गजब का है।”

दोनों भौंहों को कपाल पर चढ़ाकर सज्जन ने जानना चाहा, “दाम कितना होगा- अन्दाज कीजिए तो जरा?

निरीह भाव से बोला, “बीस रुपये से कम क्या होगा? कितना है?

सज्जन ठहाका मारकर हँसने लगे और हँसी बन्द होने के बाद बोले, “गलती आपकी नहीं है। हो सकता है, असली दाम वैसा ही कुछ होगा। मैंने बारह आना दिये थे।”

“क्या कह रहे हैं? बारह आना?

सज्जन ने बताना शुरू किया, “वो भी नहीं लेना चाह रहे थे। छगन को बहुत समझा-बुझा कर एक रुपया दिया था, उसमें से भी चार आना उसने मुझे लौटा दिये।”

मैंने और कुछ नहीं कहा। छगनलाल का मुनीम बैजूप्रसाद जब इनकी मुट्ठी में है, तो ट्रंक कौड़ियों के भाव ये ले ही सकते हैं। कहने को क्या रखा था। बैठने मिला है, बैठा रहा।

मुझे चुप देखकर सज्जन ने फिर कहा, “हालाँकि मैं एक साधारण आदमी हूँ, लेकिन लोग मेरी खातिर बहुत करते हैं। अब इसे ही देखिए- ” कहकर उन्होंने झुककर सीट के नीचे से ब्राऊन रंग का एक जोड़ा बढ़िया डर्बी शू बाहर निकाला और मुस्कुरा कर पूछा, “इसका दाम कितना होगा, कहिए तो?

“पाँच-छह रुपया तो होना ही चाहिए।” सहमते हुए बोला।

“राय साहब ने लेकिन मुझसे चार आना से ज्यादा एक पैसा नहीं लिया। हालाँकि इसके पीछे कारण है। राय साहब के बेटे की नौकरी मैंने एक ही बार बोलकर लगवा दी थी। टॉमसन साहब भी मेरी मुट्ठी में हैं।”

समझ में आ गया कि साधारण दीखने वाले ये सज्जन कोई मामूली हस्ती नहीं हैं।

शाम का धुंधलका बढ़ते जा रहा था। डिब्बे की रोशनी जल गयी। तिरछी नजरों से एकबार देखा, वे सज्जन ऊँघ रहे थे। डिब्बे के दूसरे किनारे में देखा, वही बूढ़ी सीट पर अब सिकुड़ कर बैठी हुई थी। स्वप्नालोकित तृतीय श्रेणी के इस डिब्बे में वह बूढ़ी अत्यन्त कदर्य मालूम पड़ने लगी।

 

-दो-

“वो क्या पढ़ रहे हैं?

“मासिक पत्रिका है। एक कहानी पढ़ रहा हूँ।”

सज्जन कोने से टिककर ऊँघ रहे थे। मैंने भी जेब से एक मासिक पत्रिका निकाल कर पढ़ना शुरू कर दिया था।

एक उबासी लेकर चुटकी बजाते हुए सज्जन ने पूछा, “किसका लिखा हुआ है?

“पन्नालाल चक्रवर्ती।”

“लड़की बढ़िया लिखती है। लेकिन उसकी रचनाओं से भी बेहतर उसका- ”

“पन्नालाल चक्रवर्ती महिला हैं क्या?

चवन्नी हँसी हँसकर सज्जन बोले, “सिर्फ महिला ही नहीं, बल्कि तन्वी, गौरी, युवती है।”

मैं सचमुच विस्मित हो गया। विद्युत के समान पुलक का एक सिहरन मेरे तन-मन में दौड़ गया। पन्नालाल की रचनाएं मुझे अच्छी लगती हैं। अच्छी लगती हैं- कहना ही पर्याप्त नहीं होगा, उनकी रचनाओं का मैं एक भक्त पाठक था। जहाँ कहीं भी उनकी रचना देखता था, आग्रह के साथ पढ़ डालता था। वही पन्नालाल महिला हैं- तन्वी, गौरी, युवती! 

सज्जन ने बताना जारी रखा, “टूनी तो यही कल की लड़की है! कुछ ही दिनों पहले तक तो फ्रॉक पहन कर चोटी लहराते हुए घूमती-फिरती थी। लड़की बचपन से ही तेज-तर्रार थी। एक वाक्य में कहूँ, तो अपने देश में इस तरह की लड़कियाँ मैंने ज्यादा नहीं देखी- ”

कहने की जरुरत नहीं, मेरा कौतूहल बढ़ते जा रहा था।

पूछा, “किस तरह की?

“घुड़सवारी करने, तैरने, साइकिल चलाने, फूटबॉल खेलने में उसकी बराबरी कर सकें- ऐसे लड़के ही हमारे देश में कम होंगे। भूषण से मैंने कहा था कि किसी स्वतंत्र देश में जन्म लेने पर यह लड़की रजिया-एलिजाबेथ हो सकती थी। कम-से-कम एक नामी सिनेमा स्टार तो जरूर होती। भूषण लेकिन शादी देने के लिए बेचैन हो रहा था- ”

उत्कण्ठित होकर पूछा, “भूषण कौन?

“भूषण टूनी के पिताजी हुए। बेटी की शादी करके ही माने। शादी के बाद उसने कलम थामी है। फिर भी, उसकी उड़ान देखिए लिखने की।”

सज्जन फिर ऊँघने लगे। ऐसा लगा, अस्पष्ट स्वर में उन्होंने एक बार बुदबुदाया, “टूनी- पन्नालाल चक्रवर्ती- हें!”

एक स्टेशन पर ट्रेन रुकी।

मेरे ठीक सामने वाली लम्बी सीट पर सन्थालों का एक दल बैठा हुआ था, वे सब एक साथ उतर गये। पूरी सीट खाली पाकर मैं कमर सीधी कर उस पर जाकर लेट गया। नजरें घुमाकर देखा, सज्जन कोने में बैठे ऊँघ रहे थे। उनके ऊपर वाली सीट पर एक लम्बोदर व्यक्ति खर्राटे ले रहे थे। उनका चेहरा नहीं दिखा। अनुमान लगाया, कोई मारवाड़ी होंगे।

आँखें बन्द करके सोने जा रहा था। बारम्बार एक ही बात मन में चक्कर काट रही थी- पन्नालाल चक्रवर्ती- तन्वी, गौरी, युवती!

 

-तीन-

धम्म की एक आवाज हुई।

हड़बड़ा कर उठ बैठा। ऊपरवाली सीट से वे मारवाड़ी सज्जन कूदकर नीचे आये थे- और कोई बात नहीं थी। अच्छे से देखा उनको, मेरा अनुमान गलत था। सज्जन मारवाड़ी नहीं, बँगाली ही थे। खिचड़ी मूँछों वाले भारी-भरकम सज्जन का पाजामा उतर गया था- कूदकर नीचे उतरने के कारण। उसे सम्भाल कर नीन्द से फूली बड़ी-बड़ी लाल आँखों से खिड़की के बाहर देखते हुए सज्जन बैठ गये।

सुबह हो रही थी। घूमकर देखा, ट्रंक के मालिक वे सज्जन अब ऊँघ नहीं रहे थे। स्टेट्समैनलेकर वाण्टेडकॉलम ध्यानपूर्वक देख रहे थे। मैंने फिर एकबार सोने की कोशिश की। नीन्द नहीं आयी। फिर भी, आँखें बन्द किये पड़ा रहा। कुछ देर में आँखें भी खोलनी पड़ीं। ट्रेन आकर बैण्डेल स्टेशन पर खड़ी थी। चाय की आशा में उठ बैठा और हाँक लगाकर मिट्टी की भाँड़ में चाय का जुगाड़ किया।

खिचड़ी मूँछों के मालिक और ट्रंक के मालिक, दोनों को भी चाय लेते हुए देखा। पन्नालाल चक्रवर्ती के प्रसंग को एकबार और छेड़ने की सोच ही रहा था कि बिना बादल की बिजली के समान एक अकल्पनीय काण्ड घट गया। दुबला, छरहरा एक चश्माधारी युवक हमारे कूपे के बाहर बाहर खड़े होकर उल्लसित स्वर में बोल उठा, “अरे, यह क्या? पन्नालाल बाबू आप! कहाँ जा रहे हैं?

खिचड़ी मूँछों के मालिक ने हँसकर उत्तर दिया, “कोण-नगर।”

“जब भेंट हो ही गयी है, तो अब नहीं जाने दूँगा आपको। कोन्नगर शाम को जाईएगा, अभी यहीं उतर जाईए। बहुत दिनों से साहित्य चर्चा भी नहीं हुई है। इस महीने की कहानी-कुंकुमपत्रिका में आपकी ‘घूमता पहिया’ पढ़ी। गजब की बन पड़ी है कहानी!”

कहीं मैं स्वप्न तो नहीं देख रहा?

लेकिन नहीं, थर्ड क्लास के डिब्बे में लकड़ी की सीट पर बैठकर एक भाँड़ घटिया चाय हाथ में लिये स्वप्न देखना सम्भव भी तो नहीं! ‘घूमता पहिया’ बीती रात मैंने भी पढ़ी और कहानी कुंकुमअब भी मेरी जेब में थी।

विस्मय के साथ सुना, ट्रंक के स्वत्वाधिकारी महाशय भी गद्गद् कण्ठ से बोल रहे थे, “आप ही प्रसिद्ध कहानीकार पन्नालाल चक्रवर्ती हैं?

छरहरे युवक ने गर्व के साथ बताया, “हाँ, यही हैं।”

ट्रंक के स्वत्वाधिकारी कहने लगे, “नमस्कार, नमस्कार। यह तो बड़े अप्रत्याशित ढंग से आपसे मुलाकात हो गयी! इतनी दूर साथ आये, परिचय ही नहीं था। मैं आपका एक भक्त पाठक हूँ। ...अच्छा तो यहीं उतर रहे हैं। ठीक है, नमस्कार।”

छरहरे युवक के साथ विख्यात कहानीकार पन्नालाल चक्रवर्ती उतर गये। ट्रेन भी चल पड़ी।

मिट्टी की भाँड़ को खींचकर खिड़की से बाहर फेंका और ट्रंक के मालिक से मुखातिब हुआ।

संक्षेप में ही बोला, “यह क्या बात हुई?

“कौन-सी बात?

सज्जन ने विस्मित होकर उल्टे मुझसे ही प्रश्न किया।

“कमाल है, कल रात आपने मुझे बताया कि पन्नालाल चक्रवर्ती एक महिला हैं, उनको आप पहचानते हैं, और यहाँ- ”

निर्विकार भाव से सज्जन बोले, “और क्या-क्या कहा था?

“यही कहा था कि उस ट्रंक की कीमत बारह आना है, जूते का दाम चार आना है- ”

गम्भीर भाव से सज्जन बोले, “जिन्होंने कहा था, वे चले गये हैं। मैं दूसरा आदमी हूँ।”

“नहीं समझा- ”

सहसा सज्जन के चेहरे पर हँसी खिल उठी।

हँसते हुए बोले, “पाँच पैसे के भांग के लड्डू का नशा और कितनी देर तक रहेगा, बताईए? कल नशे की हालत में मालूम हुआ था कि पन्नालाल चक्रवर्ती महिला हैं, ट्रंक का दाम बारह आना है, जूते का दाम चार आना है। अब नशा उतर गया है; अब देख रहा हूँ कि पन्नालाल की मूँछें हैं और याद आ रहा है कि उस ट्रंक और उन जूतों के दाम क्रमशः साढ़े तेरह और पौने सात रुपये दिये थे मैंने। यह थ्योरी ऑव रिलेटिविटीहै, नहीं समझे?"

समझा और चुपचाप रहा।

अचानक बोगी के दूसरे कोने से आवाज आयी-

“अरे बबुआ, तू कहाँ?

नजरें उठाकर देखा, वही दुर्गन्ध वाली बूढ़ी मुझे बुला रही थी।

रात समझ नहीं पाया था- अभी पहचाना, मौसी के घर की पुरानी दाई रूकमणिया! जब मौसी बिहार में थीं, तभी से रूकमणिया मौसी के घर में है। छुट्टी लेकर अपने गाँव गयी थी, मौसी की बीमारी की खबर पाकर लौट रही थी।

बूढ़ी के पास जाकर बैठा। बूढ़ी महाबीर जीकी पूजा करके आ रही है, ताकि मौसी जल्दी ठीक हो जाय। अपनी मलिन साड़ी के आँचल से महाबीर जी का परसादनिकालकर मुझे दिया खाने के लिए। आनन्द के साथ मैंने उसे खाया।

वाकई, ‘थ्योरी ऑव रिलेटिविटीहोती है!

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